Experiences of Satsangis: बेटा! अभी चले जाओ -सत्संगियों के अनुभव – पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर
डॉ. राम सिंह इन्सां पुत्र श्री इन्दराज सिंह निवासी बड़ौत जिला बागपत अपने पर हुई पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की रहमतों का वर्णन करते हैं कि मैंने 1970 में पूजनीय परमपिता जी से नाम की अनमोल दात ग्रहण कर ली थी। मैं हर मासिक सत्संग पर सरसा दरबार में आया करता था।
सन् 1975 में मैंने पूजनीय परमपिता जी के पास अर्ज़ की कि पिता जी, हमारे उत्तर प्रदेश में भी सत्संग करो जी। परमपिता जी ने रोहताश सिंह रांधी को अपने पास बुला लिया और पूछा कि यू.पी. में सत्संग कहाँ पर करें। इसी दौरान मैंने अर्ज़ की कि पिता जी, किशनपुर बराल गांव रांधी का है, वहीं पर सत्संग कर दो जी। तो रांधी जी ने कहा कि ठीक है वहीं रख लेते हैं। इस तरह किशनपुर बराल का सत्संग मंजूर हो गया।
मैंने साध-संगत को बड़ौत से बराल ले जाने के लिए साध-संगत के साथ मिलकर एक बस तथा पाँच घोड़े-तांगें लगाए और मुनादी करवाई कि आना-जाना तथा खाना फ्री होगा। उस सत्संग पर बड़ौत से बड़ी संख्या में लोग गए तथा लगभग सभी ने नाम की दात ले ली। उसके बाद बड़ौत से काफी साध-संगत हर माहवारी सत्संग पर सरसा दरबार आने लगी। सन् 1979 की बात है। मैं बड़ौत की साध-संगत के साथ सरसा दरबार आया हुआ था। सत्संग का कार्यक्रम चल रहा था। पूजनीय परमपिता जी स्टेज पर विराजमान थे। मैं कविराजों के पीछे वाली साइड में बैठा हुआ था।
रागी दलीप सिंह जी शब्द बोल रहे थे। पूजनीय परमपिता जी ने उन्हें चल रहे शब्द के बीच रोककर कहा कि ये बोलो ‘डॉ. राम सिंह अभी जाना है, अपना हस्पताल संभालना है।’ रागी दलीप सिंह ने वैसे ही साजों के साथ बोल दिया। पूजनीय परमपिता जी ने फिर मुझे आदेश फरमाया कि ‘बेटा, अभी बड़ौत चले जाओ।’ मुझे प्रशाद देकर बड़ौत के लिए भेज दिया। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि बात क्या है? मैं पूजनीय परमपिता जी का हुक्म मानकर बड़ौत के लिए चल पड़ा। दरबार से सरसा शहर में पहुंच गया। उसी दौरान एक गाड़ी मेरे पास आकर रूकी। गाड़ी का ड्राईवर मुझसे पूछने लगा कि दिल्ली जाना है क्या? मैंने कहा कि हाँ जी। उस गाड़ी द्वारा दिल्ली, फिर दिल्ली से बड़ौत (यू.पी.) पहुंच गया। घर पहुँचा तो देखा कि बहुत सारे लोग घर में इकट्ठे खड़े हैं।
एक लड़के के रोने की आवाज़ आ रही है। मैंने देखा तो वह मेरा भतीजा राजू ही था। परिवार ने बताया कि कल इसके पैर जल गए थे। डाक्टरों को दिखाया तो किसी ने भी इसका इलाज नहीं किया। वे कह रहे हैं कि इसको दिल्ली ले जाओ या मेरठ। हमारे पास जले का कोई इलाज नहीं है। परिवार के पास इतना सामर्थ्य भी नहीं था जो बड़े अस्पताल में उसका उपचार करवा सकें। मैंने मालिक सतगुरु का नारा बोलकर इलाज करना शुरु कर दिया।
पहले इंजेक्शन लगाया, फिर ड्रिप लगा दी और मरहम पट्टी भी कर दी। परिजनों को कहा कि सभी बैठकर इसके लिए अरदास करो और सुमिरन करो। उसके बाद उस लड़के को नींद आ गई। फिर मैंने सभी को बताया कि पूजनीय परमपिता ने मुझे सत्संग में से उठाकर घर भेजा है। सभी सतगुरु जी का शुक्राना करने लगे और उन्होंने बताया कि सारे परिवार ने मिलकर पूजनीय परमपिता जी से अरदास की थी कि पिता जी, डॉ. राम सिंह को अभी जल्दी से जल्दी घर भेज दो।
हमारा बच्चा जलने के कारण तड़प रहा है। हमारी अरदास जैसे ही पूजनीय परमपिता जी तक पहुंची तो उन्होंने तुम्हें वापिस घर भेज दिया। ऐसे सतगुरु का देन दिया ही नहीं जा सकता। वह लड़का राजू इन्सां था जो अब बरनावा दरबार में बिजली समिति में सेवादार है। डॉ. राम सिंह बरनावा दरबार में सत्संग के दौरान मरीजों को दवाई देने की सेवा किया करते थे। अब वे सतगुरु जी से ओड़ निभा चुके हैं जी।

































































