currency yoga and health

currency yoga and health  मुद्रा योग और स्वास्थ्य
हाथों से हम दुनियां भर के काम करते हैं लेकिन इन हाथ की अंगुलियों में हमारे स्वास्थ्य का खजाना छिपा हुआ है, यह शायद हम नहीं जानते। भारतीय ऋषि-मनीषियों की यह विद्या जिसे ‘मुद्रा योग’ कहा जाता है, आज प्राय: लोग भूल गये हैं जो हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। यहां कुछ हस्त मुद्राओं का वर्णन किया जा रहा है जिसे सर्वप्रथम मैंने आजमाया है और बाद में लिखने के लिए प्रेरित हुआ हूं।

आप दूरदर्शन देखते समय, लोकल ट्रेन में जाते वक्त, सभा-गोष्ठी में इन मुद्रायोग को कर सकते हैं और चमत्कारी लाभ प्राप्त करेंगे, बशर्ते धीरज व दृढ़ आस्था के साथ और नित्य प्रति करना होगा। यह नहीं कि गोली ली और ठीक हो गये। यह हस्त मुद्रा तो ऋषियों की देन है। बिना दवा लिए स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने का अनूठा तरीका है।

पिछले कई साल से मैं इसका उपयोग कर रहा हूं और आशातीत लाभ मिला है जैसे वायु मुद्रा से घुटनों, कमर और कंधों के दर्द में राहत मिली है। वायु मुद्रा करने के बाद प्राण मुद्रा करने से दोहरा लाभ
है।

जुकाम और खांसी के लिए सैकड़ों रूपये की दवाएं ली फिर भी ठीक नहीं हुआ लेकिन लिंग मुद्रा करने से दो हफ्ते में ही आराम मिला। कोई अन्य दवा लेने की जरूरत नहीं हुई। इन मुद्राओं को कोई भी कर सकता है क्योंकि बहुत ही सरल हैं। आप भी इन मुद्राओं को कीजिए और इनका चमत्कार देखिए।

Table of Contents

तो आइये देखते हैं कि इन मुद्राओं को कैसे करना है?

वायु मुद्रा

इसमें तर्जनी को (पहली अंगुली) अंगूठे के आधार या जड़ से स्पर्श करते हैं और फिर अंगूठे से हल्का सा दबाते हैं। बाकी तीनों अंगुलियों को सीधा रखिये। इस मुद्रा को पांच-सात मिनट करने से दर्द कम हो जाता है। इसको हम दिन में तीन-चार बार कर सकते हैं। इसको करने से तुरंत लाभ होता है।

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लाभ –

यह मुद्रा गठिया, जोड़ों का दर्द, घुटनों का दर्द, संधि शोध (आर्थराईट्स), लकवा, कम्पन, वायु विकारों आदि के लिए बहुत ही लाभदायक है। यह वायु विकार दूर करके देह में उसका संतुलन बनाए रखती है। वायु मुद्रा के बाद प्राण मुद्रा को करने से बहुत चमत्कारिक लाभ होते है।

प्राण मुद्रा

यह मुद्रा कनिष्ठा (छोटी अंगुली), अनामिका (तीसरी अंगुली) और अंगूठे के स्पर्श से बनती है। बाकी दोनों अंगुलियां सीधी रखिये चित्रानुसार!

लाभ –

इस मुद्रा से जीवन को शक्ति और स्फूर्ति मिलती है। कमजोर व्यक्ति शक्तिशाली बन जाते हैं। यह मुद्रा नेत्र रोगों और हर प्रकार के रोगियों के लिए प्रभावशाली है। विटामिनों की कमी को दूर करती है। इस मुद्रा को प्रतिदिन नियमित रूप से करने से बहुत लाभ होते हैं। दिन में तीन से चार बार पांच-सात मिनट तक करना चाहिए।

अपानवायु मुद्रा

इसे मृत संजीवनी मुद्रा भी कहा जाता है। वायु मुद्रा की तरह तर्जनी (अंगूठे के पास वाली पहली अंगुली) को अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे के अग्रभाग को बीच की दोनों अंगुलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकर रखें। चित्रनुसार सबसे छोटी उंगली को सीधा रखना है। जितनी बार चाहो, इसको कर सकते हैं।

लाभ –

हृदय तथा पूरे शरीर की बैचेनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है। हृदय और रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) के रोगी को पंद्रह मिनट दिन में दो समय करना लाभप्रद है। इस मुद्रा का अभ्यास हजारों रोगियों द्वारा किया गया और आशातीत सफलता मिली है।

सूर्य मुद्रा

अनामिका, सबसे छोटी अंगुली के पास वाली यानी तीसरी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के जड़ से स्पर्श करना है और अंगूठे से अनामिका को हल्का सा दबाना है तथा शेष तीनों अंगुली को सीधा खड़ा रखना है।

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लाभ –

शरीर में एकत्रित अनावश्यक चर्बी को दूर करने के लिए यह एक उत्तम मुद्रा है। वसा (कोलेस्ट्रोल) कम होने से चिंता भी कम होती है।

वरूण मुद्रा

मध्यमा अर्थात् सबसे बड़ी अंगुली को मोड़कर उसके अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श कराएं। शेष तीन अंगुलियां सीधी रहें। इसे जल मुद्रा भी कहते हैं।

लाभ –

यह मुद्रा जल तत्व की कमी के कारण होने वाले रोग जैसे कि रक्तविकार और उसके फलस्वरूप होने वाले चर्म रोग व पाण्डुरोग (एनीमिया) आदि दूर हो जाते हैं। त्वचा का सूखापन दूर होकर वह मुलायम हो जाती है इस मुद्रा के करने से।

ज्ञान मुद्रा

तर्जनी अर्थात् प्रथम अंगुली को अंगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श कराएं। शेष तीनों उंगलियां सीधी खड़ी रखें।

लाभ –

मानसिक रोग जैसे कि अनिद्रा अथवा अतिनिद्रा, कमजोर स्मरण शक्ति, क्रोधी स्वभाव आदि हो तो यह मुद्रा अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होगी। पूजा ध्यान में एकाग्रता होगी। इस मुद्रा का अभ्यास प्रात: 2 से 3 मिनट तक करना चाहिए।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि आप इन मुद्राओं का अभ्यास आज से ही प्रारंभ कर दें तथा धैर्य व आस्था के साथ करें। हजारों-लाखों रूपये खर्च करने पर भी दवाओं से लाभ नहीं मिलता जबकि इन मुद्राओं के अभ्यास से विस्मयजनक लाभ प्राप्त होता है।

यदि आपको लाभ नहीं मिलता तो आपकी ओर से अभ्यास में धीरजता में, विश्वास में कमी मुख्य वजह हो सकती है। इन मुद्राओं का अभ्यास करते हुए, खान-पान व आचार-विचार में संयम रखने से स्वास्थ्य ठीक रह सकता है।
-आर डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’

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