Children’s Story: बाल कथा: झूठ पकड़ा गया
एक दिन बालू बंदर स्कूल से घर आ रहा था। तभी रास्ते में एक पेड़ के नीचे उसे एक खरगोश सोता हुआ दिखाई दिया। पास ही खरगोश की नई चमचमाती साईकिल खड़ी थी। साईकिल देखकर बालू के मन में लालच आ गया, ‘अगर यह साईकिल मुझे मिल जाए तो मजा आ जाएगा!’ उसने सोचा, ‘रोज स्कूल पैदल आने-जाने से मुझे बड़ी तकलीफ होती है। साईकिल होगी तो मैं रोज साईकिल से ही आया जाया करूंगा लेकिन यह साईकिल मुझे मिलेगी कैसे!’ वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा।
एकाएक उसकी नज़र साईकिल के ताले पर पड़ी। साईकिल का ताला खुला हुआ था। ‘लगता है खरगोश साईकिल का ताला लगाना भूल गया!’ बालू ने सोचा और खुश हुआ, ‘चलो, अच्छा हुआ मैं चुपके से इसकी साईकिल पर बैठकर फरार हो जाता हूँ। इसे पता भी नहीं चलेगा कि साईकिल कौन ले गया!’ यह सोचकर वह साईकिल पर बैठकर वहाँ से फरार हो गया। कुछ देर बाद खरगोश की नींद खुली तो अपनी साईकिल वहां न देख कर वह चौंक गया।
‘अरे, मेरी साईकिल कौन ले गया!’ वह बेचैनी से साईकिल खोजने लगा लेकिन साईकिल उसे नहीं मिली। बेचारा बहुत दुखी हुआ। जरा सी लापरवाही के कारण उसकी नई साईकिल चोरी हो गई थी। मगर वह साईकिल में ताला लगा देता तो साईकिल चोरी नहीं होती। खरगोश आँसू बहाता हुआ अपने रास्ते चल दिया। उधर खरगोश की नई साईकिल लेकर बालू सीधा अपने घर गया। बालू को नई साईकिल पर देखकर उसके पापा ने पूछा, ‘अरे बेटा, यह साईकिल किसकी है?’
बालू जानता था कि उसके पापा साईकिल के बारे में उससे जरूर पूछेंगे, इसलिए उसने पहले ही सोच लिया था कि उसने क्या जवाब देना है। उसने खुशी से चहकते हुए बताया, ‘मुझे आज स्कूल में एक प्रतियोगिता जीतने पर यह साईकिल इनाम में मिली है।’ ‘शाबाश!’ पापा उसकी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘तुम स्कूल की प्रतियोगिताओं में भाग लेते हो, यह बड़ी अच्छी बात है। आज हर बच्चे को हर प्रकार की छोटी बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते रहना चाहिए। इससे जहां उनमें आत्मविश्वास आ जाता है, वहीं इनाम मिलने पर उनका हौसला भी बढ़ता है।’
बालू ने साईकिल बरामदे में खड़ी कर दी और अंदर चला गया। तभी वहाँ वही खरगोश पहुँच गया। बालू के पापा से उसकी जानपहचान थी। उसे देखते ही बालू के पापा ने स्वागत करते हुए कहा, ‘अरे, आओ-आओ! खरगोश भाई, आज कैसे रास्ता भूल गए?’ ‘बंदर भाई मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था कि रास्ते में मेरे साथ एक घटना हो गई।’ खरगोश ने उसे उदासी भरे स्वर में साईकिल चोरी होने की बात बता दी।
उसकी बात सुनकर बंदर उससे सहानुभूति जताता हुआ बोला, ‘यह तो बहुत बुरा हुआ खरगोश भाई लेकिन तुमने थाने में रिपोर्ट तो लिखा दी है न?’ ‘नहीं, अभी तक तो नहीं लिखाई है।’ ‘तुम्हें तुरंत रिपोर्ट लिखवा देनी चाहिए ताकि पुलिस अपनी कार्रवाई शुरू कर दे।’ उसने सलाह दी। ‘तुम ठीक कहते हो। मैं अभी जाता हूँ।’ खरगोश ने कहा। अचानक उसकी नज़र बरामदे में खड़ी अपनी साईकिल पर पड़ी, ‘अरे, यही तो है मेरी साईकिल।’ वह साईकिल को नज़दीक से देखकर मुआयना करता हुआ बोला।
‘लगता है तुम्हें भ्रम हो गया है!’ बंदर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘यह साईकिल मेरे बेटे बालू को स्कूल में इनाम में मिली है।’
‘नहीं बंदर भाई, मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यही मेरी साईकिल है।’ ‘अच्छा रूको, मैं अपने बेटे को बुलाता हूँ, तुम उसी से पूछ लो।’ इतना कहकर उसने बालू को आवाज दी। ‘क्या बात है पापा?’ बालू ने बाहर आकर पूछा।
‘बेटा, इनसे मिलो, ये मेरे मित्र हैं।’ पापा ने खरगोश की तरफ इशारा करके कहा, ‘इनका कहना है कि यह साईकिल, जो तुम्हें इनाम में मिली है, इनकी है। जब ये रास्ते में एक पेड़ के नीचे सो रहे थे तभी कोई चुरा कर भाग गया।’ खरगोश को देखकर बालू सकपका गया। उसने सोचा, ‘झूठ बोलने से अब कोई फायदा नहीं है क्योंकि मेरी चोरी पकड़ी जा चुकी है।’
‘प… पापा यह सच कहते हैं।’ बालू गरदन नीची किए धीरे से बोला, ‘यह साईकिल इन्हीं की है। मैंने आपसे झूठ बोला था कि साईकिल मुझे इनाम में मिली है। मुझे माफ कर दीजिए। ऐसी गलती दोबारा कभी नहीं होगी।’ मुझे माफ कर दीजिए। ऐसी गलती दोबारा कभी नहीं होगी।’
पापा को यह सुनकर बहुत दु:ख हुआ और साथ ही गुस्सा भी बहुत आया। खरगोश बोला, ‘बंदर भाई जाने दो। पहली बार गलती की है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसने अपनी गलती कबूल ली है।’ फिर खरगोश बालू को समझाते हुए बोला कि बालू बेटा, चोरी करना बहुत बुरी बात है। अगर मैंने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी होती, तो तुम्हें धारा 378-379 के अंतर्गत जेल भी हो सकती थी। बालू बुरी तरह डर गया और खरगोश से पैर पकड़कर माफी मांगने लगा।
खरगोश बोला, ‘बेटा, मैं तुम्हें यह सब बताकर डरा नहीं रहा हूँ, बल्कि सचमुच मैं चाहता हूँ कि तुम नेक इन्सान बनो। माफी तो तुम्हें मिल जाएगी लेकिन एक शर्त पर!’ बालू सकपका कर खरगोश की ओर देखने लगा। खरगोश हँसते हुए बोला, ‘तुम्हें मेरे साथ साईकिल पर मेरे घर तक चलना पड़ेगा।’ बालू की जान में जान आई और हँसते हुए खरगोश के साथ चल पड़ा।
-हेमंत कुमार यादव
































































