Monsoon

Monsoon: लो आ गई बारिशें

भागदौड़ भरी जिंदगी में बड़ी राहत देने का काम करती हैं ये बारिशें। फुर्सत मिले तो इनके साथ विचरना। घर की तंग दीवारों से बाहर निकलकर कुछ देर छप-छप करते इसके मीठे साज को सुनना। टप-टप पड़ती बूँदों को निहारना। रोम-रोम से अपने अंदर खींचना। जब भी हो, जैसे भी हो बारिश में टहलकर देखना, ज़िंदगी कितनी खूबसूरत दिखने लगती है।

बारिशों का मौसम बड़ा अज़ीज़ होता है। अज़ीज़ भी ऐसा कि जिसका हम एक मेहमान की तरह इंतज़ार करते हैं। आने से पहले ही इसके चर्चे शुरु हो जाते हैं। खबरों में पहले ही इसकी आहट सुनने लगती है। बारिशें कैसे रंग जमाएंगी ये तो आने पर ही पता चलता है लेकिन खबरचियों का हल्ला पहले ही गूंजने लग जाता है। ये खबरची जैसे हर किसी को न्यौता देने का काम करते हैं। इनके हवाले से ही पूरा देश अपनी तैयारियों में जुट जाता है।

इसी खुसर-फुसर में देश का पूरा तंत्र बड़ा व्यस्त हो जाता है। बारिशों के मिजाज को लेकर तरह-तरह की अटकलबाजियों का बाज़ार गर्म हो जाता है। बारिशों के तेवर तीखे होने वाले हैं तो अलग से तैयारियां, तेवर फीके रहने की खबरें हैं तो अलग से तैयारियां। मतलब सबके अपने-अपने जिक्र, अपने-अपने फिक्र। ऐसे लगता है जैसे ये बारिशें भी, साजिशें लेकर आ रही हैं। खबरों से ही पूरी हलचल मच जाती है। जैसे जगजीत सिंह की गज़ल है-

‘तेरे आने की जब खबर महके,
तेरी खुशबू से सारा घर महके’

जैसे ही बारिशें अपनी दस्तक देती हैं तो सौंधी-सौंधी खुशबू से पूरा वातावरण महक उठता है। भयंकर तपिश से बेजान हुआ जनमानस तरोताज़ा हो जाता है। कुम्लाई, मुर्झाई वनस्पति खिलखिला उठती है। नीरस हो चुकी धरा फिर से हरी-भरी होने लगती है। पंछी-परिंदे भी चहकने लगते हैं। नाचते-कूदते, गीत गाते खुले आसमान में अपनी उड़ारियों से बताने लगते हैं कि मौसम खुशगवार हो गया है। सरसराती हवाओं के झौंके भी बारिशों के राग अलापने लग जाते हैं। अपने रंग में हर किसी को रंग लेती है ये बारिशें। क्या धरा, क्या आसमां हर चीज़ में निखार आ जाता है।monsoon

बरकतें ही तो हैं ये बारिशें। पूरी कायनात के लिए सौगात हैं ये। बात सिर्फ पानी की थी कि पानी बरसेगा। इससे भी बहुत आगे ज़िंदगी के ताने-बाने से जुड़ी होती हैं ये बारिशें। यही कारण है कि हर किसी को इनका इंतज़ार रहता है। इन्हीं के साथ सबको अपने-अपने नफे-नुक्सान का अनुमान होने लगता है। सबके अरमान जुड़े होते हैं इनसे। इन अरमानों को बारिशों का पानी लगता है और वो फलते-फूलते हैं। इन्हीं फुहारों से बाज़ार भी हरा-भरा होता है।

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फुहारों से बाज़ार की चमक बढ़ जाती है। सौदागरों की तो मानों चांदी बन जाती है। उनके भी मन में लड्डू फूटने लगते हैं। बिजनस-व्यापार में जैसे किसी क्रांति का आगाज़ हो गया हो। बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों से लेकर रेहड़ी-पटरी वालों को अपने कारोबार में रौनक दिखाई देने लगती है। देश में हर घर का बजट इन्हीं बारिशों से ही तय होने लगता है। हो भी क्यों ना, क्योंकि अर्थजगत के लिए रीड की हड्डी भी तो बारिश को ही कहा जाता है।

अर्थजगत की पूरी जिम्मेवारी सिर्फ इन्हीं के कंधों पर टिकी होती है। जैसे बारिशें अच्छी होंगी तो फसलें भी अच्छी होंगी और फसलें अच्छी होंगी, बाज़ार में चहल-पहल भी अच्छी होगी। यही कारण है कि बारिश को लेकर ही सबकी निगाहें टिकी रहती हैं। जहाँ इनका फेरा न पड़े, वहाँ के हालात पतले हो जाते हैं। तरस जाते हैं वो इनके दर्शनों को। जहाँ इनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं वहाँ फिर बड़ी मिन्नत-मनोव्वल की जाती है इनको को बुलाने की। इसके लिए बड़े सांग रचे जाते हैं। अपने-अपने रीति – रिवाजों, परम्पराओं को प्रस्तुत करके इनको बुलाने के बड़े यत्न किए जाते हैं।

सामूहिक तौर पर यज्ञ किए जाते हैं। देखा होगा आपने भी, मीठे चावल बांटे जाते हैं। जगह-जगह भंडारे लगाए जाते हैं। प्रार्थनाएँ की जाती हैं। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जीअ-तोड़ प्रयास किए जाते हैं। अर्थात् हर प्रकार से तिकड़मबाजी लगाई जाती है ताकि बारिश हो जाए। हर प्र्रकार की परम्पराओं के तौर-तरीके अपनाए जाते हैं। जब कभी बारिशों की बेरूखी हो जाए। इनकी बेरूखी से जैसे रोज़ी-रोटी का सवाल खड़ा हो जाता है। ऐसे लगने लगता है कि इस बार पानी नहीं बरसा तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। इनका भी तो कोई विश्वास नहीं। ना आए तो ना आए और आ जाए तो घटा बन कर आ जाती है कि जल-थल एक कर देती है। पता नहीं कब ये तौबा-तौबा भी करवा दे। इनके भी जैसे अपने फरेब हैं, पैंतरें हैं। ऐसे आज़ाद पंछी की तरह हैं जिनका कोई ठौर-ठिकाना भी न हो।

इन बारिशों के अपने किस्से-कहानियाँ हैं। अपने राग हैं। अपने साज़ हैं। मानव जीवन के साथ इनका संबंध खास है। पेड़-पौधों को हमारी धरती का श्रृंगार माना जाता है और उस श्रृंगार को सजाने वाली, साज-सज्जा करने वाली असल में ये बारिशें ही तो हैं। इन मानसूनी बारिशों का तो कहना ही क्या! इनका आना मुरादें पूरी होने जैसा होता है। पहले इनका इंतज़ार और फिर जब ये बरसती हैं तो इनका खुमार सिर चढ़ कर बोलता है। महिला हो या पुरुष, बच्चे हों या बुजुर्ग सब पर जादुई असर होता है। इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में बड़ा राहत देने का काम करती हैं ये।

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फुर्सत मिले तो इनके साथ विचरना। घर की तंग दीवारों से बाहर निकलकर इनमें कुछ देर तक रचना। छप-छप करते इसके मीठे साज़ को सुनना। टप-टप पड़ती बूँदों को निहारना। रोम-रोम से अपने अंदर खींचना। जब भी हो, जैसे भी हो बारिश में टहलकर देखना, ज़िंदगी कितनी खूबसूरत दिखने लगती है। फुर्सत में हर चीज़ से हटकर कुछ देर ही सही, जरूर बारिश को निहारें। तन-मन से भीगें। कुछ वक्त अपने लिए भी निकालें। कुछ पल बारिशों के साथ जीएं। इन पलों की सुनहरी याद तुम्हें हर रोज़ तरो-ताज़ा बनाए रखेगी।

अपने बड़ों से पूछना। कितना आनन्द माना है उन्होंने इन बारिशों का। उनके पास एक बड़ा किस्सा होगा इन बारिशों से जुड़ी कहानियों का। बड़ी टोलिया बना-बना कर खेला है उन्होंने इन बारिशों में। बारिश तो उनके लिए किसी मेले में कम न थी। कोई बंधन नहीं था। कोई बंदिश नहीं उनके लिए खासकर इन बारिश के दिनों में। कच्चे मकान थे तब। कच्ची गलियाँ थी और बारिश आते ही सब गलियों में आ जाते। जितनी तेज बारिश, उतनी ज्यादा उनकी मस्ती। पानी में तैरना, खेलना, कूदना, दौड़ना, पता नहीं कैसे-कैसे करतब करते थकते नहीं थे वो।

बारिशों का मौसम तो पूरा धमाल-चौकड़ी वाला होता था। माँ-बाप भी बेफिक्री में रहते। बच्चों की मस्ती उनकी अपनी मस्ती होती थी। बच्चों को इस प्रकार अठखेलियां करते देख उन पर भी एक अदद खुशी का खुमार चढ़ जाता था। कोई रोक-टोक नहीं बल्कि जैसे ही बारिश आई, बच्चों को भीगने के लिए, नहाने के लिए हौंसला देना और जब बारिश रूकने के बाद मस्ती करके बच्चे घर आते तो उन्हें फिर गर्मागर्म दूध का गिलास देना। इन बारिशों का पूरा दौर इसी प्रकार निकलता था। वो भी जमाना था, वो भी दिन थे बचपन के मस्ती भरे। बचपन आज भी है, बारिशें आज भी हैं लेकिन…वो मस्ती कहां… वो कश्ती कहां…!

पेड़-पौधों को हमारी धरती का श्रृंगार माना जाता है और उस श्रृंगार को सजाने वाली, साज-सज्जा करने वाली असल में ये बारिशें ही तो हैं। इन मानसूनी बारिशों का तो कहना ही क्या! इनका आना मुरादें पूरी होने जैसा होता है। पहले इनका इंतज़ार और फिर जब ये बरसती हैं तो इनका खुमार सिर चढ़ कर बोलता है।

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