खबरदार! किसी को नहीं बताना! -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम
प्रेमी इंद्र सिंह पुत्र श्री बचित्र सिंह गांव लक्कड़वाली जिला सरसा से शहनशाह मस्ताना जी महाराज के एक करिश्मे का इस प्रकार वर्णन करता है:-
बचपन से ही मेरे विचार धार्मिक थे। परमात्मा को पाने की इच्छा थी। पाकिस्तान बनने से पहले मैंने बाबा सावण शाह जी महाराज का सत्संग सरसा शहर में सुना था पर उस समय मैंने नाम-शब्द नहीं लिया था।
उसके बाद मैंने शहनशाह मस्ताना जी महाराज की बड़ाई लोगों से बहुत सुनी। लोग कहा करते कि सरसा में एक फकीर मस्ताना जी है जो मकान बनाता है और गिरा देता है। रूपए-नोट, सोना-चांदी, कपड़े आम ही बाँटता है, किसी से कुछ नहीं लेता। दुनिया में लोग माँग-माँग कर खाते हैं। पर वह ऐसा फकीर है जो देता ही देता है। मैंने अपने मन में सोचा कि आज के जमाने में ऐसा तो हो नहीं सकता। अपने गाँव की संगत के साथ सन् 1958 में शहनशाह मस्ताना जी महाराज के दर्शन करने के लिए डेरा सच्चा सौदा सरसा में गया। जब शहनशाह मस्ताना जी महाराज के दर्शन किए तो बस! उनका ही होकर रह गया। मैंने उसी सत्संग पर नाम-शब्द ले लिया।
जब भी शहनशाह मस्ताना जी महाराज सरसा या आस-पास कहीं भी सत्संग करते तो मैं उनकी मेहर से वहीं पर पहुंच जाता। मेरे बापू जी को मेरा सत्संगों पर जाना अच्छा नहीं लगता था। जब भी मैंने सत्संग पर कहीं जाना होता तो वे इस बात का बहुत विरोध करते। मैं अकसर उनसे चोरी-छुपे ही सत्संग पर चला जाता। बाकी सारे परिवार ने बेपरवाह जी से नाम-शब्द ले लिया था पर मेरा बापू मेरे परमार्थ के रास्ते में रुकावट बन गया। मैंने अपने बापू को कहा ‘बताओ, गुरू होना चाहिए या नहीं?’ वे कहते कि ‘मैं जानता हूँ कि बात सही है, पूरा गुरु जरूर होना चाहिए।
मैंने कहा ‘बापू बता, तूने कौन सा गुरु ढूंढा है?’ मुझे मस्ताना जी स्वयं भगवान का रूप लगते हैं। मैं आपके साथ बहस नहीं करना चाहता। इस बात को लेकर मेरे बापू व मेरे बीच अकसर ही कहासुनी हो जाया करती थी। एक दिन मैंने सुमिरन करते समय सच्चे पातशाह मस्ताना जी के चरणों में अर्ज़ कर दी कि हे सतगुरु जी! मेरे बापू को नाम-दान अवश्य प्रदान करो जी।
एक दिन शहनशाह मस्ताना जी ने गदराना गाँव में जाना था। लक्कड़वाली गाँव की संगत को पता था कि सच्चे पातशाह जी 11 बजे वाली गाड़ी (ट्रेन) से आएंगे। इसलिए हमने गाड़ी आने से पहले ही चाय तैयार कर ली थी। गदराना का एक प्रेमी बेपरवाह मस्ताना जी के लिए वहां पर एक रथ लेकर आया था। जब रेवाड़ी-सरसा से बठिण्डा को जाने वाली गाड़ी लक्कड़वाली स्टेशन पर रुकी तो साध-संगत के साथ कुल मालिक वाली दो जहान शहनशाह जी भी गाड़ी से उतरे। गाड़ी से उतरते ही भजन मण्डली का ढोल बजने लगा, साज बजने लगे, संगत नाचने लगी।
संगत में एक प्रेमी फुलकारी पहन कर नाच रहा था। शहनशाह जी ने उसे वचन किए, गुम रह, गुम रह अर्थात गुप्त रह। नाचने वालों में कुछ माता-बहनें भी थी। उस समय जो शब्द बोला जा रहा था उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं:-
अरे मुसाफिर! अजल स्पैशल आने वाली है।
टिकट कटा ले, तेरे भले की कहूं।
थोड़ा खा, तेरे भले की कहूं।
थोड़ा सो, तेरे भले की कहूं।
अजल स्पैशल आने वाली है।
शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने बोले जा रहे उक्त भजन के बीच में ही फरमाया ‘कच्छ (बगल) में खेस (बिस्तर) तेरे भले की कहूं।’ नाचते व गाते हुए प्रेमी पैदल ही गदराना गांव की ओर जा रहे थे। रथ खाली ही आगे-आगे जा रहा था। सतगुरु जी भी पैदल ही संगत के साथ चल रहे थे। मैं और कर्म सिंह शहनशाह जी के आने से पहले ही लक्कड़वाली रेलवे स्टेशन पर आ गए। हमने साध-संगत के लिए स्टेशन पर बनी दुकान पर चाय का प्रबन्ध किया था। वहीं स्टेशन के सामने ही मेरा घर था। शहनशाह मस्ताना जी ने गदराना गांव में सत्संग फरमाया।
उसी दिन सच्चे पातशाह जी ने वापिस सरसा आना था। शहनशाह जी ने पांच बजे वाली गाड़ी पर सरसा के लिए चढ़ना था। मैंने सोचा कि आज मौका है बापू को नाम दिलाने का। उसके बाद तो पिताजी सरसा चले जाएंगे। मैं अपने बापू की बाजू पकड़ कर वहीं ले आया। इतने में बेपरवाह मस्ताना जी साध-संगत के साथ वहां पर पहुंच गए। मैंने अपने बापू को कहा कि आज मौका है नाम ले ले। मैं अपने बापू जी को बेपरवाह मस्ताना जी के चरणों में ले गया। मेरे बापू ने सच्चे पातशाह जी से पूछा आपका दौलतखाना। बेपरवाह जी ने फरमाया ‘बिलोचिस्तान।
मैंने फिर अपने बापू की बाजू पकड़ ली और मैं उससे लड़ने लगा। दो आदमी मुझे पकड़ कर एक तरफ ले गए। वह कहने लगे कि तेरा नमूना और है, तेरे बाप का और है। वहीं रेलवे स्टेशन के सामने तीन मजदूर मजदूरी पर कच्ची र्इंटें निकाल रहे थे। सच्चे पातशाह जी उन मजदूरों के पास स्वयं चलकर गए और उनसे पूछा कि एक हजार र्इंट निकालने के कितने रुपए लेते हो? तो वे कहने लगे कि जी, चार रुपए। शहनशाह जी ने दरबार के सेवादार को कहा कि इन्हें दस-दस रुपए दे दो क्योंकि इनकी दसां नहुआं दी कमाई है।
शहनशाह जी ने उन मजदूरों को फरमाया, इन रूपयो की कोई अच्छी चीज लेनी है। इतने में रेलगाड़ी आ गई। बेपरवाह मस्ताना जी गाड़ी में चढ़ गए। सरसा जाने वाली साध-संगत भी चढ़ गई और गाड़ी चल पड़ी। मैंने अपने बापू को कहा कि सतगुरु जी से कोई अच्छी बात करनी थी। तेरे को अच्छा मौका मिला था पर तूने कुछ फायदा नहीं उठाया। इसके तीन महीने बाद मेरे बापू की मृत्यु हो गई। मैंने सोचा मेरे बापू ने नाम नहीं लिया, चौरासी लाख जूनियों में जाएगा, नरकों में जाएगा। मैं बहुत निराश हो गया कि अपने बापू को नाम नहीं दिलवा सका।
उपरोक्त घटना के डेढ़ वर्ष बाद एक दिन मैं अकेले में सुमिरन कर रहा था। अचानक ही मुझे अपने बापू का ख्याल आया कि मरते समय मेरे बापू का नाक टेडा हो गया था। उसी समय मुझे सर्वसामर्थ सतगुरु मस्ताना जी महाराज के सामने से दर्शन हुए। मेरे बापू की आवाज आई ‘तूने मुझे बचा लिया है जो जबरदस्ती बेपरवाह मस्ताना जी के मुझे दर्शन करवा दिए।’ मैंने उनको कहा कि तू बाबा जी (मस्ताना जी) की तरफ हाथ कर।
उन्होंने तेरे को सब कुछ दिया है। इसके बाद बेपवाह मस्ताना जी महाराज ने फरमाया ‘खबरदार! खबरदार! खबरदार! किसी को नहीं बताना। तेरे बाप का फलां घर में जन्म हुआ है। तू भी उसके घर नहीं जाना।’ कुल मालिक वाली दो जहान ने मेरे बापू को दोबारा मनुष्य जन्म देकर उसका उद्धार कर दिया। बेपरवाह मस्ताना जी ने अपनी दूसरी बॉडी में पूजनीय परमपिता जी के रूप में उसे नाम देकर मोक्ष दे दिया।
सतगुरु सर्वसामर्थ स्वयं ही कुल मालिक हैं। सतगुरु के हाथ बहुत लंबे होते हैं। जो काम इन्सान सोच भी नहीं सकता वह काम सतगुरु कर सकता है और करता है। पूरे गुरु का शिष्य जो सच्ची तड़प, लगन से सोचता है सतगुरु उपरोक्त अनुसार उसे अवश्य पूरा करता है। बेपरवाह जी के इन वचनों से मेरी चिंता मिट गई। मैं जो चाहता था मेरी वो बात पूरी हो गई। मुझे शहनशाह जी ने दिखा दिया कि मेरा बापू कहीं नर्कों में नहीं, बल्कि सतगुरु ने उसकी संभाल कर ली है।





























































