Inspirational story: प्रेरक कथा: सुपने दे पुत पोते…
ख्याली पुलाव से कभी पेट नहीं भरता। लेकिन फिर भी इन्सानी दिमाग में यह पकते रहते हैं। ऐसे पुलावों से बचना बड़ा मुश्किल है। ऐसे पुलावों का प्रलोभन मन की दशा बिगाड़ देता है। इन्सान अपनी दिशा से ही भटक जाता है। हद तो तब होती है जब कोई अपना सब कुछ खत्म कर बैठे। मतलब, हकीकत को समझे ही ना। इससे बचने का एकमात्र जरीया है संतों का सत्संग। सत्संग में असलियत की समझ आती है।
पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज शेख चिल्ली की कहानी सुनाते हुए समझाते हैं कि एक शेख चिल्ली था, जो काम करने में बहुत आलसी था, लेकिन वह ख्वाब बहुत देखा करता था। एक बार एक सेठ ने उसे तेल का टीन घर तक पहुंचाने को कहा और आठ आने मजदूरी देने की बात तय हुई। शेख चिल्ली ने पीपा सिर पर रख लिया और चल पड़ा। वह ख्वाब देखने लगा कि मैं आठ आने का एक अण्डा लाऊंगा।
उसमें से चूजा निकलेगा। चूजे से मुर्गी बन जाएगी। वह मुर्गी अण्डे देगी। उन अण्डों में से बहुत से चूजे और बहुत मुर्गे-मुर्गियां मेरे पास हो जाएंगी। फिर मैं उन्हें बेचकर गाय-भैंसे खरीद लाऊंगा। उनका दूध बेचूंगा। इस प्रकार मेरे पास बहुत पैसे जमा हो जाएंगे। इससे मैं अपना बहुत बड़ा मकान बनवाऊंगा। मैं बहुत अमीर हो जाऊंगा। यह सब मीठे-मीठे ख्वाब वह सोचता चला जा रहा था। उसे यह भी ध्यान न रहा कि मेरे सिर पर तेल का पीपा है। वह और आगे की सोचने लग गया। एक दिन मेरा अपना महल बन जाएगा। फिर मैं बहुत अच्छे घर में अपनी शादी करवाऊंगा।
मेरे बच्चे हो जाएंगे और वह मुझे बापू-बापू कहेंगे। यह सोचकर उसके मन में कुछ गुदगुदी सी होने लगती है और बहुत खुश होता है। अब अचानक उसे ख्याल आता है कि थोड़ा-बहुत रोहबदार भी जरूर होना चाहिए। इस बात का ख्याल आते ही वह मूच्छों को मरोड़ते हुए थोड़ा अकड़कर चलने लगा। फिर सोचने लगा कि रोब घर से ही शुरू करना चाहिए। जब मेरी घर वाली मुझे रोटी देने आएगी तो उसको रौब दिखाऊंगा कि मैं नहीं खाता। तूने यह सब्जी क्यों बनाई है?
इसमें घी क्यों नहीं डाला, नमक ज्यादा क्यों है? मिर्च कम क्यों डाली हैं इत्यादि। ये कहते हुए मैं गुस्से में आकर थाली पर ऐसे पैर मारूंगा कि थाली दूर जाकर गिरेगी। इधर सचमुच ही उसने अपनी लात चला दी। बस लात चलाई ही थी कि स्वयं धड़ाम से नीचे गिर गया। सिर पर रखा पीपा भी गिरना ही था और सारा तेल जमीन पर बिखर गया। इधर तो यह हश्र हुआ और उधर उसके सारे ख्वाब जो अब तक सोच रहा था, सब कुछ बिखर गया।
अपने नुक्सान को देखकर सेठ को बहुत अफसोस हुआ और गुस्से में भर कर कहने लगा कि तूने मेरा तेल का पीपा गिरा दिया। मेरा बहुत नुक्सान कर दिया। शेख चिल्ली जो अब तक अपने घर-परिवार व कारोबार में खोया हुआ था, कहने लगा- सेठ जी ! आप तो अपने तेल के एक पीपे को रो रहे हो, मेरा तो सब कुछ उजड़ गया। मेरा बना-बनाया घर, बाल-बच्चे, गाय-भैंसे और इतना बड़ा कारोबार सब कुछ ही लुट गया, रोता है तेल के पीपे को।
परमपिता शाह सतनाम जी महाराज इस प्रमाण को और भी सुंदर ढंग से समझाते हैं कि ‘सुपने दे पुत पोते, कदे वेखे नहीं हल बाहुंदे।’ संतों की सोहब्बत में आने वाला ही सच-झूठ को समझ पाता है। संतजन उदाहरणों से इन्सान को समझाते हैं। रूहानी सत्संग के प्रकाश से यहाँ पर दिया गया यह ऐसा प्रकरण है जिसमें कोरी कल्पना से उपजा वाद-विवाद सोचने को मजबूर कर देता है। यह शेख चिल्ली का हास्यास्पद किस्सा है।
परमपिता शाह सतनाम जी महाराज सत्संगों में अकसर ही यह सुनाया करते ताकि इन्सान हकीकत को जाने व समझे। उनके समझाने का यही मकसद है कि इन्सान अपना जन्म बर्बाद न करे। कोरी कल्पनाओं में न रहे। -डेस्क





























































