Experiences of Satsangis: आज से तेरा नाम सुरजीतो है -सत्संगियों के अनुभव : पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत
माता जीतो रानी उर्फ सुरजीतो इन्सां पत्नी सचखंड वासी श्री कीडूराम इन्सां गाँव जमालपुर शेखां जिला फतेहाबाद, माता अपने सतगुरु प्यारे पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने पर हुई रहमतों का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं:-
सन् 1992-93 की बात है, उन दिनों मेरे पेट में नाभि के नीचे बहुत दर्द होता था। वर्णनीय है कि मैंने सन् 1970 में पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज से नाम-शब्द ले लिया था और तब से ही लंगर घर में हर मासिक सत्संग पर लंगर पकाने की सेवा करती आ रही हूँ। मेरे पति तथा बच्चों ने भी तब ही नाम ले लिया था। मुझे भी पूरा विश्वास था कि मालिक खुद ही मेरा भी दु:ख काटेगा। मैं पूरी तन्मयता से जी-जान से सेवा किया करती। मेरे परिवार वाले मुझे कहते कि तू पूज्य हजूर पिता जी के पास अपनी बीमारी की अर्ज़ कर लेकिन मैं हर बार टाल-मटोल कर देती कि इस बार मेरी पिता जी से बात नहीं हुई। वास्तव में मैं अर्ज़ नहीं करना चाहती थी।
मुझे पूर्ण विश्वास था कि मालिक स्वयं ही मेरा दु:ख काटेंगे। एक रात करीब दो बजे जब मैं सुमिरन करके सोई तो पूज्य हजूर पिता जी मेरे सपने में आ गए। पिता जी ने मुझे अपना पावन आशीर्वाद दिया। उस समय पिता जी डॉक्टर की ड्रैस में थे। सफेद ड्रैस व टोपी पहनी हुई थी। पिता जी ने पल में मेरा आॅप्रेशन कर दिया। आॅप्रेशन करके फरमाया ‘लो बेटा! तेरा दु:ख काट दिया है।’ जब मेरी आँख खुली तो पिता जी अदृश्य हो गए। उस समय मुझे इतनी खुशी हुई कि जिसका बयान नहीं हो सकता। आॅप्रेशन न कोई टांका, न कोई चीर-फाड़, न कोई जख्म और न ही कोई निशान था। वाकई यह सच्चाई है कि उसके बाद मुझे कभी भी दर्द नहीं हुआ।
इसी प्रकार एक दिन पावन अवतार माह जनवरी में पूज्य गुरु जी सेवादारों को दातें, प्रेम निशानियां बख्श रहे थे। जब मैं पूज्य पिता जी से सेवा की दात लेकर लौटी तो पिता जी ने सेवादारों को कह कर मुझे वापिस बुला लिया। मैं डर गई थी कि कहीं मेरे से कोई गलती तो नहीं हो गई। मैं पिता जी के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई कि पिता जी, मेरे से कोई गलती हो गई है तो मुझे माफ कर दो जी। पिता जी ने मुझे मुखातिब करते हुए फरमाया कि कोई गलती नहीं हुई बेटा। पहले तो तू जीतो रानी थी, और आज से तेरा नाम सुरजीतो है। मैं बहुत खुश हुई।
इस प्रकार पूज्य हजूर पिता जी ने मुझे प्रेम, अपना अपार प्यार प्रदान करते हुए ढेर सारी खुशियां बख्शी। यहाँ पर स्पष्ट किया जाता है कि बचपन में पहले मेरा नाम जीतो था और पूजनीय परमपिता जी मुझे जीतो रानी ही कहकर बुलाया करते।
बेटा! तेरा पहला नंबर है:
जब भी मौका मिलता मैं पूजनीय परमपिता जी के पास अर्ज़ करती कि पिता जी! हमारे घर चरण टिकाओ जी। तो परमपिता जी बातों-बातों में संगत को बहुत हंसाते और खुद भी खूब हँसते। एक बार पूजनीय परमपिता जी ने मुझे वचन किए कि बेटा, बेपरवाह मस्ताना जी हुक्म देंगे फिर हम तेरे घर आएंगे। फिर पूज्य हजूर पिता जी गुरगद्दी पर विराजमान हो गए। मैंने हजूर पिता जी के पास अर्ज़ की कि पिता जी, अर्ज़ करते-करते 17 साल हो गए हैं, अब तो घर आ जाओ जी और कितना तड़पाओगे जी।
हजूर पिता जी ने फरमाया, बेटा! तेरा पहला नंबर है, जरूर आएँगे। उस दिन सत्संग था। सत्संग की समाप्ति पर मैं अपने घर चली गई व अगले दिन सुबह शाह मस्ताना जी धाम में पहुँच गई। मैं पिता जी को मिलने के लिए तेरावास के पास चली गई। उस समय जी.एस.एम. सेवादार भाई वहाँ इक्ट्ठे हो रहे थे। उनमें से एक भाई ने मुझे कहा कि माता! पिता जी अभी बाग में जाएँगे तो तू जाकर बेरी के पास खड़ी हो जा। जब पिता जी आएँ तो जोर से नारा लगा देना। मैंने वैसे ही किया। मैं वहाँ खड़ी थी और जैसे ही पूज्य हजूर पिता जी मेरे नजदीक आए तो मैंने हाथ ऊपर करके जोर से नारा बोल दिया।
पिता जी मेरी तरफ आ गए। मैंने फिर अर्ज़ कर दी कि पिता जी, अब तो आ जाओ जी। अब कितने साल और तड़पाओगे। पिता जी बहुत खुश हुए और फरमाया, बेटा! तेरा पहला नंबर है, जरूर आएँगे। इतना फरमाकर पूज्य पिता जी बाग की तरफ चले गए। कुछ दिनों बाद हमारे गाँवों के पास समैण जिला फतेहाबाद में पूज्य गुरु जी का सत्संग था। मैं वहाँ अर्ज़ करने के लिए उतारे वाले घर में चली गई। मौका मिलते ही मैंने अर्ज़ कर दी कि पिता जी, अब तो चरण टिकाओ जी। पिता जी बोले-बेटा जीतो, तेरा पहला नंबर है, जरूर आएँगे।
मैं अपने घर चली गई। इतने में समैण से चार मोटरसाइकिल मेरे घर पर आए और मुझे संदेश दिया कि पिता जी तेरे घर आएँगे। मेरा रोम-रोम खुशी से नाच उठा। मेरी वो मुद्दतों की अर्ज़ आज परवान हो रही थी। फिर मैंने एक भाई से कहा कि आप मेरे घर के पास खड़े हो जाओ। पिता जी मेरे घर आ रहे हैं। कहीं आगे न निकल जाएं। आप मेरे घर का रास्ता बता देना। वो भाई हैरानी भरे लहजे में बोला कि पिता जी तेरे घर आएँगे! वो तो बड़े घरों में आएँगे। दरअसल उसका ख्याल था कि इस गरीब के टूटे-फूटे मकान में पिता जी नहीं आएँगे। मैं चुप हो गई।
परंतु पिता जी मुझे अंदर से कह रहे थे कि बेटा, पहले तेरे घर आएँगे। हमारे गाँव में हजूर पिता जी ने प्रेमी अर्जुन महत्ता जी के घर भी आना था। प्रेमी भाइयों ने सारी संगत को उनके घर में बैठाया हुआ था। जब पिता जी हमारे गाँव में पहुँचे तो सबसे पहले मेरे घर में ही पधारे। मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। मैं खुशी में झूृम उठी। मैं पिताजी के सम्मुख नाचती-नाचती कमरे तक गई जहाँ पर पिता जी के लिए चारपाई बिछाई हुई थी। मैं नाचती-नाचती शब्द बोलती जा रही थी कि
तन वारां कि मन वारां
अज तेरे उत्ते पिता जी की वारां
समझ नी आंदी की वारां।
पिता जी बोले- बेटा! तूने तो सारा कुछ ही वार दिया। जल-पान करने के बाद हमारे सारे परिवार को अपने पास बिठाकर पिता जी ने अकेले-अकेले का नाम लेकर खुशियाँ बख्शीं। फिर मुझे बोले- बेटा, तेरा सब कुछ ले लिया, फिर ना कहना कि मेरे गुरु ने ये चीज नहीं खाई। उलाहना ना देना, तेरा सारा कुछ खा लिया।
पूज्य पिता जी इस प्रकार हमें अत्यंत प्रेम व खुशियाँ बख्श कर तदोपरांत महत्ता जी के घर चले गए। वहाँ से वापसी के दौरान पूज्य पिता जी की गाड़ी एक बार फिर हमारे घर के सामने आकर रूक गई तो सारा परिवार भागकर पिता जी की गाड़ी के पास आ गया। पिता जी ने मुझे मुखातिब करते हुए फरमाया, ‘बेटा! अब तो तू खुश है, दोबारा आएँगे बेटा। ऐसे दिल करता है कि तेरे घर दो दिन रहें।
पर डेरा भी संभालना है बेटा।’ इस प्रकार पिता जी मुझे बेशुमार प्रेम व खुशियाँ बख्श कर वहाँ से रवाना हो गए। आज भी वो पल याद करके मैं खुशी में झूम उठती हूँ। खुशी संभाले नहीं संभलती। मेरी यही अरदास है कि दाता जी, अपना अपार प्यार हमेशा बख्शते रहना जी।
































































