Experience of Satsangis …और रेलगाड़ी चल पड़ी -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम
श्री बालमुकन्द नरूला मोहता मार्किट सरसा (हरियाणा) से पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के एक अलौकिक करिश्मे का वर्णन इस प्रकार करता है :-
मेरा पैतृक गाँव सुचान, सरसा से केवल 15 कि०मी० की दूरी पर है। सन् 1958 की बात है कि इस इलाके की साध-संगत की पुकार पर सच्चे पातशाह जी ने दूसरी बार सत्संग करके इस गाँव को और पवित्र कर दिया। पहली बार सन् 1954 में साथ लगते गाँवों कंवरपुरा, कसुम्भी, सुचान, कोटली, ढाणी वरियाम सिंह में दयालु सतगुरु जी ने सत्संग फरमाए थे। अनेकों जीवों को अपनी नज़र मेहर के द्वारा भवसागर से पार लगाया।
सन् 1958 में दोबारा फिर इन्हीं गांवों में शाह मस्ताना जी महाराज ने सत्संग फरमाए। अनेकों जीवों की बुराइयां छुड़वा कर उन्हें इन्सानियत का पाठ पढ़ाया और राम-नाम से जोड़ा। पूज्य बेपरवाह जी ने गाँवों में खूब मस्ती छोड़ी और इस तरह साध-संगत को बेअन्त खुशियाँ बाँटी। उस समय आने-जाने के साधन बहुत ही कम हुआ करते थे। कच्ची पगडंडियां व ऊँचे-नीचे कच्चे रास्ते थे। लोग पैदल या ऊँटों आदि पर ही आया-जाया करते थे। शहनशाह जी ने मौके के अनुसार जैसा साधन मिला या पैदल ही पहुँच कर संगत को निहाल किया व उनका नसीब बनाया। सभी निर्धारित गाँवों में सत्संग फरमाकर बेपरवाह जी सरसा वापिस जाने के लिए सुचान गाँव के रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे थे।
सतगुरु जी के साथ काफी साध-संगत थी जिनमें से कुछ ने सरसा वापिस जाना था और कुछ शहनशाह जी को विदा करने के लिए आए थे। प्रीतम प्यारे की नज़र मेहर से सभी प्रेमी खुशी में नाच रहे थे। बेपरवाह जी के साथ-साथ पैदल ही नाचते-गाते खुशी से झूमते हुए रेलवे स्टेशन के नजदीक बाहर ग्राउँड में पहुँच गए। रेलगाड़ी आने में अभी कुछ समय बाकी था। वहीं पर ग्राउँड में ही सच्चे सतगुरु जी विराजमान हो गए। ढोल बजने लगा। प्रेमी-जन प्रेम में मस्त होकर जोर-शोर से नाचने लगे। कुल मालिक जी खुशियाँ लुटा रहे थे। वातावरण मस्तोमस्त हो गया।
साध-संगत सब कुछ भूलकर दर्शनों में मग्न थी। इतने में रेलगाड़ी भी ठीक समय पर रेलवे स्टेशन पर पहुँच गई। रेलगाड़ी दो-तीन मिनट तक रूकी रही और फिर रोजमर्रा के अनुसार सीटी बजी व रेलगाड़ी चल पड़ी। लेकिन यहाँ एक अनोखी घटना घट गई। जैसे ही गार्ड ने हरी झंडी दिखाकर गाड़ी चलने का इशारा किया, तो अकेला र्इंजन ही चल पड़ा। गाड़ी के सभी डिब्बे वहाँ पर ही रूके रहे क्योंकि डिब्बों व इंजन का जोड़ खुल गया था।
रेलवे के सभी कर्मचारी हैरान रह गए कि यह जोड़ कैसे खुल गया? ऐसा अपने आप तो हो ही नहीं सकता? सभी रेलवे कर्मचारी और वहाँ पर मौजूद लोग इसकी चर्चा कर रहे थे कि यह अपने-आप कैसे हो गया? ड्राईवर कहने लगा कि अब जोड़ ठीक करके लगा लेंगे फिर नहीं खुलेगा।
रेलवे कर्मचारियों ने जोड़ लगा कर पूरी तसल्ली करके रेल के र्इंजन को चलाया। जब र्इंजन चला तो जोड़ फिर खुल गया। किसी की समझ में नहीं आया कि जोड़ क्यों और किसलिए खुल रहा है? सभी इस बात पर अत्याधिक आश्चर्यचकित थे कि ऐसा क्यों हो रहा है? उनके कुछ समझ नहीं आ रहा था। उधर शहनशाह जी अपने मस्त फकीरी आलम में खुशियाँ बरसा रहे थे। गाड़ी रूकने की खबर संगत तक भी पहुंच चुकी थी लेकिन किसी ने शहनशाह जी को इस बारे में कुछ नहीं बताया। रब्बी मौज के सामने किसी की हिम्मत ना पड़ी। बेपरवाही मौज अपने नूरानी अंदाज में नूरो-नूर थी। वहीं रेलवे कर्मचारी गाड़ी न चलने से पूरे परेशान हो चुके थे।
तब एक भले मानस ने उनको बताया कि रेलवे स्टेशन के बाहर एक कामिल फकीर बैठा है। उनके साथ संगत भी है। उन सभी ने इसी गाड़ी पर सरसा जाना है। वो फकीर अपने-आप में मस्त है। ढोल बज रहा है और संगत नाच रही है। फिर तुरंत रेलवे के सभी कर्मचारी इकट्ठे होकर शहनशाह जी के चरणों में गए और विनती की, ‘बाबा जी! गाड़ी में बैठो जी।’ उनकी पुकार सुनकर दाता जी तुरन्त उस रेलगाड़ी में चढ़ गए।
उनके साथ ही सरसा जाने वाली संगत भी चढ़ गई। जैसे ही शहनशाह जी रेलगाड़ी पर सवार हुए, वही गाड़ी जिसे चलाने में कर्मचारियों के हाथ खड़े हो गए थे, देखते ही देखते चल पड़ी। यह देख रेलवे स्टाफ भी दंग रह गया। सब शहनशाह जी के इस कौतुक से निहाल हो गए। वो भी शहनशाह जी के रब्बी जलाल के सामने नतमस्तक हो गए। रेलगाड़ी में सवार सभी सवारियों में भी इसी चमत्कार की चर्चा होने लगी। इस साखी से स्पष्ट है कि सतगुरु सर्वसामर्थ होता है, वो जो चाहे कर सकता है। नोट: श्री बालमुकन्द इन्सां अब सचखण्डवासी हो गए हैं।































































