Green Manure भूमि की उर्वरक शक्ति बनाने में कारगह है हरी खाद
अधिकांश किसान आज भी पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं और अजैविक (रासायनिक) खाद का अत्यधिक उपयोग करते हैं। इसका असर यह होता है कि खेतों की मिट्टी धीरे-धीरे कठोर हो जाती है और उसकी उर्वरक क्षमता भी कमजोर होने लगती है। धान उत्पादक किसानों द्वारा एक ही फसली चक्र अपनाया जाता है। धान के बाद हर बार गेहूँ ही बोया जाता है। इस एकरूपता के कारण फसलों में एक जैसे रोग और कीटों के संक्रमण की संभावना भी काफी बढ़ जाती है।
गेहूँ की कटाई के बाद खेत लगभग 2 से 3 महीने तक खाली रहता है, और इस खाली समय का सही उपयोग किया जा सकता है। अगर इस अवधि में खेत में ढैंचा उगाया जाए, तो यह न सिर्फ समय का सदुपयोग होगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बढ़ेगी। ढैंचा लगाने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे अगली धान की फसल के लिए जमीन और अधिक अनुकूल बन जाती है। इसके अलावा, ढैंचा अतिरिक्त नाइट्रोजन भी प्रदान करता है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है।
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मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि करती है हरी खाद
ढैंचा एक दलहनी फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से हरी खाद और बीज के लिए की जाती है। ढैंचा के हरे पौधे का उपयोग हरी खाद के रूप में किया जाता है, जो न केवल मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाता है, बल्कि फसल की उत्पादकता को भी बेहतर बनाता है। ढैंचा की खेती से खेत की उर्वरक शक्ति बढ़ जाती है और रासायनिक खाद का प्रयोग कम करना पड़ता है। इससे फसल स्वस्थ रहती है और अधिक पैदावार मिलती है, क्योंकि ढैंचा के पौधे मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों को जोड़ते हैं, इससे मिट्टी की उर्वरता में काफी वृद्धि होती है।
कारगर है दलहनी फसल
यह एक दलहनी फसल है, जो भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत सहायक मानी जाती है। ढैंचा की जड़ों में राइजोबियम नामक लाभकारी जीवाणु पाया जाता है, जो वातावरण से नाइट्रोजन को खींचकर मिट्टी में जमा करता है। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है, बल्कि फसल उत्पादन भी बेहतर होता है। ढैंचा की हरी खाद से प्रति एकड़ 35 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राप्त होती है, जिससे मिट्टी की संरचना में सुधार आता है। ढैंचा को खेत में मिट्टी में मिलाने के बाद, अगली फसल में नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों की आवश्यकता एक-तिहाई तक कम हो जाती है, जिससे लागत घटती है और भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
हर मिट्टी के लिए उपयुक्त
ढैंचा लगभग हर प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन दोमट या हल्की रेतीली मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त होती है। अम्लीय या क्षारीय मिट्टी को भी ढैंचा कुछ हद तक सहन कर लेता है। यदि मिट्टी की जांच में पीएच मान 9.3 से अधिक हो, तो जिप्सम की उचित मात्रा का प्रयोग करना आवश्यक होता है। पंजाब ढैंचा-1 जल्दी बढ़ने वाली किस्म है। इसके बीज मोटे होते हैं। यह लगभग 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसका उत्पादन 7-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है।
जुलाई तक हो सकती है बिजाई
हरी खाद प्राप्त करने के लिए 20 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ ड्रिल मशीन से 20 से 22 सेंटीमीटर की दूरी पर मई से जुलाई के बीच बोना चाहिए। जबकि बीज उत्पादन के लिए 8 से 10 किलोग्राम बीज 45 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में जून के मध्य से जुलाई तक बोने की सिफारिश की जाती है। हरी खाद या बीज उत्पादन के लिए बोई गई फसल में 12 किलोग्राम फॉस्फोरस तत्व (लगभग 75 किलोग्राम सिंगल सुपरफॉस्फेट) प्रति एकड़ बुवाई के समय डालना चाहिए। यदि पहले उगाई गई फसल में पर्याप्त मात्रा में फॉस्फोरस का प्रयोग किया जा चुका हो, तो ढैंचा के लिए अलग से फॉस्फोरस देने की आवश्यकता नहीं होती।

































































