Be happy मना करिए खुश रहिए
कई लोग ऐसे होते हैं, जो हर काम को हर समय ना ही बोलते हैं। यह भी सही नहीं है। ‘इन्सानियत’ हमारा धर्म है। जरूरत के समय दूसरों की मदद भी जरूर करनी चाहिए। लेकिन ‘होणा मस्त ते रहणा होशियार चाहिदा।’ कहीं ऐसा ना हो कि इन्सानियत की आड़ में कोई आपका नाजायज फायदा उठा जाए।
अपनी इमेज बिगड़ने के डर से मानसी किसी को भी किसी भी काम के लिये मना नहीं कर पाती थी। इसी का सब फायदा उठाते लेकिन जब मानसी की तबियत खराब रहने लगी, उसे आराम की जरूरत थी, तब भी जिन्हें उससे फायदा उठाने की आदत थी, वे उसे काम बताते रहे। कुछ कह न पाने के कारण मानसी बुझी-बुझी सी रहने लगी।
मानसी कुछ दिन के लिए अपनी दीदी के पास जयपुर गई। वहाँ उसकी दीदी ‘पर्सनैलिटी गू्रमिंग’ पर क्लासेज लेती थीं। उनकी क्लास में लैक्चर देने के लिये एक विदेशी महिला को बुलवाया गया था। मानसी ने भी लैक्चर अटैंड किया। उनके लैक्चर का विषय था ‘हाउ टू से नो’।
लैक्चर सुन कर मानसी की आँखें खुल गई। उसे समझ में आ गया कि वह कितनी बड़ी गलती कर रही थी। सबसे भली बनने की चाह में वह अपने जीवन, अपनी खुशियों के साथ कितना बड़ा अन्याय कर रही थी।
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हमेशा हाँ कहना मारक है:-
जब आपके पास कोई काम लेकर आता है, तो आप उसे करने के लिए तैयार हो जाते हैं, जबकि आपके पास पहले से ही करने वाले बहुत से काम पड़े होते हैं।
ऐसे में होता है स्ट्रैस। फिर आप चिड़चिड़ाते हैं और तरह-तरह के स्नैक्स खाते हैं। टीवी के आगे बैठकर रिलैक्स होने की कोशिश करते हैं पर होता है ब्लड प्रेशर बढ़ना, आर्टरीज का सिकुड़ना तथा दिल की बीमारी, कैंसर जैसे जानलेवा रोग और मनोरोगों का आक्रमण।
हमेशा अपने को नंबर वन मानें:-
ऐसा करना स्वार्थी होना कदापि नहीं, बल्कि यह अपने को बचाए रखने का नुस्खा है। एक जिम्मेदार मानव होने के नाते स्वयं की देखभाल करना भी आपका कर्तव्य है। परिवार की जिम्मेदारियाँ और जॉब की परेशानियों में इतना न डूब जाएं कि स्वयं को भुला दें। अपने आपको नम्बर वन पर रखें।
न कहने की प्रेक्टिस करें:-
न कहना भी आदत में शुमार कर लें। कई बार होता यह है कि आप हमेशा ओब्लाइज़ करने और हाँ कहते रहने के लिए ही अपने आपको कंडीशन कर लेते हैं। फिर उस सिंड्रोम से निकल नहीं पाते। यही गलती आपके जीवन का शाप बन आपकी खुशियाँ लील ले जाती है और जीवन रस सोख लेती है।
अगली बार जब आपसे कुछ करने को कहा जाए और आप तय नहीं कर पाए कि आप उसे करना चाहते हैं या नहीं, तो आप यह कहकर कि आप बाद में यह बताएंगे, समय ले लें। इस समय में आप तय करें कि आप वह काम करना चाहते हैं या नहीं या आपके पास इसके लिए पर्याप्त समय भी होगा या नहीं। तभी आप हाँ या न का फैसला करें।
कहने का मतलब यह है कि हर बार हाँ कहना उचित नहीं होता है, इसलिए ना कहना भी अपनी जीवन शैली में शामिल करें। सिर्फ ऐसा सोचकर कि ‘मैं इनका काम नहीं करूंगा/करूंगी, तो इनको बुरा लग जाएगा! या ये मुझे तव्वजो नहीं देंगे!’ अपने ऊपर एक्सट्रा वर्क का बोझ ना लादें। अन्यथा परेशान रहने लगेंगे, जोकि टेंशन का मुख्य कारण बन जाता है। इसलिए ना कहना सीखें और हमेशा खुश रहें। -उषा जैन





























































