A Story काला अक्षर भैंस बराबर -कहानी
‘कोकिला, आपको प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं आफिस में।’ प्राथमिक स्कूल का चपरासी सफाई करने वाली बहन से कहने आया। ‘मुझे क्यों बुला रहे हैं? मैं तो अपना काम ठीक से करती हूँ। सभी बच्चों को साफ प्यालों में पानी पिलाती हूँ। मटके भी रोज साफ करके ठंडा पानी भरती हूँ।’ कोकिला पिछले पाँच सालों से लिटिल स्टार नर्सरी और प्राथमिक स्कूल में पानी पिलाने वाली की नौकरी कर रही थी।
‘मुझे नहीं पता साहब क्यों बुला रहे हैं।’ इतना कहकर चपरासी चला गया। कोकिला सोच में पड़ गई। बचपन में ही कोकिला के माता-पिता टीबी की बीमारी से चल बसे थे। श्यामलाजी से आगे छोटे से गाँव सीतापुर में वह अपने काका के घर रहकर बड़ी हुई थी। काका का स्वभाव अच्छा था, लेकिन काकी बहुत सख्त थी। छोटी कोकिला से सारे घर के काम बर्तन, सफाई, पानी भरना, सब करवाया जाता था। इसलिए उसे स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला।
काका ने बहुत कोशिश की, लेकिन काकी साफ कह देती थी, ‘लड़कियों को पढ़ाकर क्या करना है? आखिर में तो घर का काम और बच्चों को ही संभालना है।’ बेचारी कोकिला। उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर थे। उसे पढ़ना-लिखना बिल्कुल नहीं आता था। इसका उसे बहुत दु:ख होता था, लेकिन उसके हालात ने कभी साथ नहीं दिया।
समय बीतते देर नहीं लगती। कोकिला जवान होने लगी। भगवान ने उसे बहुत मीठी आवाज़ दी थी। बिना किसी प्रशिक्षण के ही वह भजन और भक्ति गीत इतने सुरीले स्वर में गाती कि लोग झूम उठते। काकी के दूर के रिश्तेदार का बेटा तीस साल का हो गया था, लेकिन बेरोजगार और शराबी होने के कारण उसकी शादी नहीं हो पा रही थी। रमीला काकी ने कोकिला की शादी उससे कराने की बात चलाई और दो लाख रुपए में सौदा तय कर दिया, लेकिन कोकिला के काका का मन इसे मान नहीं रहा था।
एक शाम कोकिला बाहर का काम करके घर लौट रही थी। तभी घर में काका-काकी के बीच जोरदार झगड़ा हो रहा था।
‘तुम मेरी भतीजी को दो लाख रुपए में बेचकर पैसा कमाना चाहती हो, यह बिल्कुल भी ठीक नहीं है।’ रमन गुस्से से बोले।
‘अरे शांति रखो। जवान लड़की को घर में रखना मतलब घर में सांप पालना। तुम्हें समझ नहीं है। सामने से दो लाख रुपए मिल रहे हैं तो क्या बुरा है?’ रमीला समझाते हुए बोली।
दरवाजे के बाहर खड़ी बीस साल की कोकिला यह सब सुनकर रो पड़ी। उसी रात जब काका-काकी सो गए, तो वह अपना बैग भरकर चुपचाप निकल पड़ी और शहर जाने वाली बस में बैठकर अहमदाबाद आ गई। अहमदाबाद जैसे बड़े शहर में बिना पहचान के कहाँ जाए? वह घर-घर जाकर झाड़ू-पोछा और बर्तन का काम करने लगी, लेकिन अकेली लड़की के लिए अहमदाबाद जैसे शहर में रहना आसान नहीं था।
आखिर उसकी मेहनत रंग लाई। लिटिल स्टार नर्सरी और प्राइमरी स्कूल के प्राचार्य मैकवान सर को उसकी दयनीय हालत पर दया आ गई। उन्होंने स्कूल में पानी पिलाने वाली की नौकरी दे दी और पास की खाली पड़ी एक छोटी-सी कोठरी में रहने की भी व्यवस्था कर दी। पाँच साल से कोकिला अपना काम ईमानदारी और मेहनत से कर रही थी, लेकिन आज अचानक साहब क्यों बुला रहे हैं, वह सोच में पड़ गई।
‘सर, मैं अंदर आ सकती हूँ?’ कोकिला ने पूछा। ‘आओ कोकिला! सरकारी विभाग से आदेश आया है कि स्कूल का हर कर्मचारी कम से कम सातवीं कक्षा तक पढ़ा-लिखा होना चाहिए और उसे पढ़ना-लिखना आना चाहिए।’ मैकवान सर ने कहा। ‘सर, मैं तो अनपढ़ हूँ। मुझे पढ़ना-लिखना भी नहीं आता।’ कोकिला घबराकर बोली। ‘तो क्या करें? तुम्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी।’ मैकवान सर ने भारी मन से कहा।
‘सर, अब मैं कहाँ जाऊँगी? मुझे नौकरी कौन देगा?’ यह कहते-कहते कोकिला रोने लगी। मैकवान सर ने उसे समझाते हुए कहा, ‘देखो, तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी है। मैं रोज़ तुम्हें गाते हुए सुनता हूँ। मेरा एक मित्र अशोक त्रिवेदी गुजराती फिल्मों के निर्माता हैं। मैं उनसे तुम्हारी सिफारिश करूंगा। शायद तुम्हें वहाँ काम मिल जाए।’ त्रिवेदी साहब ने जैसे ही उसके दो गीत सुने, वह झूम उठे, ‘वाह! क्या आवाज़ है!’
और कोकिला बन गई स्वर किन्नरी कोकिला। उसे कई गुजराती फिल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में काम मिलने लगा। उसके भजन के एल्बम बहुत लोकप्रिय होने लगे। दो ही सालों में रॉयल्टी की कमाई से कोकिला लाखों की मालकिन बन गई। उसके खाते में बीस लाख रुपए जमा हो गए। एक दिन बैंक मैनेजर ने खुद फोन करके उसे बुलाया, ‘देखिए कोकिला मैडम, आपके बीस लाख रुपए सेविंग खाते में केवल साढ़े चार प्रतिशत ब्याज पर पड़े हैं।
अगर इन्हें कहीं और निवेश किया जाए तो ज्यादा कमाई हो सकती है।’ ‘इसके लिए क्या करना होगा?’ कोकिला के लिए यह सब बिल्कुल नया था। ‘मैं आपको कुछ म्यूचुअल फंड और एफडी में पैसे लगाने की सलाह देता हूँ। आपको लगभग बारह प्रतिशत तक लाभ मिल सकता है।’ मैनेजर ने समझाया। ‘ठीक है, मुझे क्या करना होगा?’ कोकिला ने पूछा। ‘बस इन दो-तीन फार्म पर साइन कर दीजिए।’ मैनेजर ने फार्म आगे बढ़ाते हुए कहा।
कोकिला बोली, ‘साहब, मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूँ। मुझे पढ़ना-लिखना तो दूर, साइन करना भी नहीं आता।’ मैनेजर हैरान होकर बोला, ‘अरे, आप बिल्कुल अनपढ़ हैं और फिर भी लाखों की मालिक बन गई! अगर पढ़ी-लिखी होतीं तो शायद अरबपति बन जातीं!’ अब हँसने की बारी कोकिला की थी। वह हँसते हुए बोली, ‘साहब, अगर मैं सिर्फ सातवीं तक भी पढ़ी होती तो आज भी लिटिल स्टार नर्सरी में बच्चों को पानी पिला रही होती।’
पूरी कहानी सुनकर बैंक मैनेजर और स्टाफ के सभी लोग हैरान रह गए। सच है, किसी भी परिस्थिति में हार मानकर बैठे रहने के बजाए अपनी प्रतिभा और रुचि के अनुसार काम करते रहिए। क्या पता किस मोड़ पर किस्मत आपका साथ दे दे। फल की चिंता किए बिना कर्म करते रहिए। -अनिकेत सिंह




























































