Self-start सेल्फस्टार्ट
सुबह के साढ़े आठ बजे थे। कॉलोनी के मोड़ पर रमनलाल अपने पंद्रह साल पुराने स्कूटर की फटाक-फटाक किक मार रहे थे। तभी एक बीस साल के आईटी प्रोफेशनल युवक ने बाइक का बटन दबाया, स्क्रीन पर डिजिटल लाइटें चमकीं और गाड़ी आवाज़ के बिना स्टार्ट हो गई। उसने हँसकर रमनलाल पर तंज कसा, ‘अंकल जी! अब ज़माना आॅटोमेशन का है।
कब तक इस खटारे को किक मार-मारकर अपना घुटना तोड़ोगे! इसे बेचो और सेल्फस्टार्ट ले लो! बटन दबाओ और लाइफ स्मूथ।’ रमनलाल ने हांफते-हांफते स्कूटर को डबल स्टैंड पर चढ़ाया। जेब से रुमाल निकाल कर मुँह पोंछा और हँसकर बोले, ‘बेटा, तुम्हारी बटन वाली डिजिटल दुनिया देखने में बहुत खूबसूरत लगती है, लेकिन यह रोज़ सुबह किक मारने की जो प्रक्रिया है, वह मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी फिलॉसफी सिखाती है।’
‘वह कैसे अंकल?’
रमनलाल ने स्कूटर के हैंडल पर हाथ रखकर कहा, ‘देखो बेटा! हमारी मध्यमवर्गीय ज़िंदगी भी इस स्कूटर जैसी ही है। जैसे- मंहगाई और जिम्मेदारियाँ हमें ऐसा जाम कर देती हैं कि हमारा आगे बढ़ने का मूड ही नहीं होता। तब ज़िंदगी को चालू करने के लिए रोज़ सुबह थोड़ी किक मारनी पड़ती है। पहली किक परिवार की जिम्मेदारी की, दूसरी किक बच्चों के भविष्य की, तीसरी किक आशा की।
दो-तीन बार असफल भी हो जाएं, पैर में चोट भी लगे, लेकिन जब चौथी किक पर यह इंजन धुएं का गुब्बार निकालकर फड़-फड़ करता हुआ जीवित हो उठता है, तब असली आनंद मिलता है।’ रमनलाल ने मुस्कुरा कर कहा, ‘तुम सेल्फस्टार्ट वालों को सब कुछ रेडीमेड और बिना मेहनत के चाहिए होता है। इसीलिए जब ज़िंदगी में कोई बड़ा झटका या आर्थिक मंदी आती है ना, तब यह बटन वाली पीढ़ी तुरंत डिप्रेशन में आ जाती है। हमें तो यह स्कूटर ही रोज़ सुबह पछाड़ खाकर भी सेल्फ मोटिवेट होकर स्टार्ट होना सिखाता है।’
इतना कहकर रमनलाल ने पूरी ताकत से एक आखिरी किक मारी। स्कूटर एक जोरदार गर्जना के साथ चालू हो गया। रमनलाल हंसते-हंसते गियर डालकर आगे निकल गए और वह युवक अपनी साइलेंट गाड़ी पर बैठा-बैठा अभी-अभी जानी हुई फिलॉसफी को मन ही मन नमन करने लगा कि ज़िंदगी का असली पावर रेडीमेड बटन में नहीं, बल्कि परिस्थिति के सामने किक मारकर खड़े होने के जज्बे में है। -वीरेन्द्र बहादुर सिंह





























































