journey खुद से खुद तक का सफर
यह बात कुछ महीने पहले की है। मैं ज्यादातर समय उदास रहने लगी थी। इससे पहले कि मैं पाठकों से कुछ सांझा करूँ, अपने बारे में थोड़ा बताना चाहूँगी।
मैं एक कॉलेज प्रोफेसर हूँ। कहा जाता है कि आध्यात्मिक क्षेत्र में सच्चे गुरु पहले स्वयं अभ्यास करते हैं और फिर शिष्यों को सिखाते हैं, लेकिन सांसारिक जीवन में शिक्षक या गुरु को बच्चों को सिखाते-सिखाते स्वयं भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
एक छोटे से लेखक के रूप में मेरा मन अक्सर चाहता है कि मैं दूसरों से ऐसे अनुभव सांझा करूँ, जो शायद उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें। जीवन के उतार-चढ़ाव में कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई हल नहीं होता जैसे किसी को लाइलाज बीमारी हो जाए, वहाँ दवा-दारू के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन रोजमर्रा की जिÞंदगी में हम कई बार अपनी ही सोच में इतने उलझ जाते हैं कि वह हर पल की शांति छीन लेती है और हम बिना किसी ठोस कारण के भीतर ही भीतर परेशान रहते हैं। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हो रहा था।
बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लग रहा था न कोई बड़ा दुख, न कोई विवाद, न कोई वास्तविक समस्या फिर भी भीतर एक भारीपन लगातार बना रहता था। मैं किसी से अपनी बात सांझा भी नहीं कर पा रही थी, अगर सच कहूँ तो कोई “समस्या” थी ही नहीं। केवल विचार थे-लगातार चलते हुए, बिना रुके, बिना थमे। कभी अतीत की छोटी-छोटी घटनाएँ बार-बार मन में उभर आतीं- “ऐसा क्यों हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिए था तो कभी मन, भविष्य को लेकर डर और अनिश्चितता की कहानियाँ गढ़ लेता।
वर्तमान में रहते हुए भी मैं बिना किसी ठोस प्रमाण के दूसरों के बारे में अनुमान लगाने लगती थी “उसने मुझे गलत समझा होगा”, “वे मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे।” ऐसी अनथक सोचें मुझे भीतर से थका रही थीं, लेकिन मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि असली परेशानी आखिर है कहाँ। अंदर ही अंदर मैं हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में अपनी बेचैनी की वजह ढूँढ रही थी। कॉलेज के हाउस कॉम्पिटीशन के लिए जब मैं लाइब्रेरी में नैतिक शिक्षा की पुस्तकों को देख रही थी, तभी वहाँ लिखी एक कहानी ने मुझे मेरी मानसिक स्थिति पर गहराई से सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
एक प्रसिद्ध मंदिर में रोज सैकड़ों भक्त आते थे। कोई सोना चढ़ाता, कोई पैसे, कोई नारियल। मंदिर की दान-पेटी हमेशा भरी रहती थी लेकिन गाँव में झगड़े, ईर्ष्या और अहंकार ज्यों-के-त्यों बने रहते थे। एक दिन एक संत मंदिर पहुँचे और उन्होंने पुजारी से कहा कि आज दान-पेटी बंद कर दी जाए। भक्त चकित हो गए। किसी ने पूछा, “महाराज, बिना दान के पूजा कैसी?” संत मुस्कुराए और बोले, “आज भगवान ने दान नहीं, हिसाब माँगा है।”
मंदिर के बाहर एक छोटी-सी पेटी रखी गई, जिस पर लिखा था- “अपने कर्मों का लेखा डालें।” भक्तों से कहा गया कि इस पेटी में पैसे नहीं, बल्कि आज का सच डालना है। पहला भक्त काफी देर सोचता रहा और फिर बोला कि उसने आज अपने नौकर को धोखे से तनख्वाह कम दी है। दूसरी स्त्री ने स्वीकार किया कि वह रोज पूजा करती है लेकिन अपनी बहू को बेटे से झूठ बोलकर लड़ा देती है। एक युवक ने कहा कि वह मंदिर आता है, लेकिन मन में दूसरों से जलता है। धीरे-धीरे पेटी पर्चियों से नहीं, पश्चाताप से भरने लगी।
शाम को संत बोले कि आज भगवान बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि आज लोगों ने अपने दोष भगवान को नहीं, स्वयं को दिखाए हैं। भगवान तो अंतर्यामी हैं, पर इंसान कभी-कभी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना रहता है। या यूँ कहें कि वह दो पल अपने लिए निकालकर यह अहसास ही नहीं कर पाता कि वह क्या कर रहा है और उसे क्या करना चाहिए। स्वयं को जानने के लिए समय निकालना उसे समय की बर्बादी लगता है। उसी दिन के बाद गाँव में झगड़े कम होने लगे, क्योंकि लोगों ने दूसरों को सुधारने से पहले खुद को देखना शुरू कर दिया।
यह कहानी मेरे लिए आईने की तरह थी। मैं समझ गई कि मेरी बेचैनी का कारण कोई बाहरी परिस्थिति या नहीं, बल्कि मेरी अपनी सोच थी। मैं ईश्वर से शांति माँग रही थी, लेकिन खुद से कोई प्रश्न नहीं कर रही थी। यहीं से आत्म-मूल्यांकन का महत्व मेरे जीवन में स्पष्ट होने लगा। इस कहानी के नीचे मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसी सत्य की पुष्टि की गई थी। मनोविज्ञान के अनुसार हमारा मस्तिष्क प्रतिदिन हज़ारों विचार उत्पन्न करता है, जिनमें से अधिकतर या तो अतीत से जुड़े होते हैं या भविष्य की आशंकाओं से।
जब हम इन विचारों का विश्लेषण नहीं करते, तो तनाव से जुड़ा हार्मोन कॉर्टिसोल बढ़ने लगता है, जिससे उदासी, बेचैनी और थकान बढ़ती है। इसके विपरीत, जब व्यक्ति अपने विचारों पर प्रश्न करता है “यह सोच सच है या केवल अनुमान?” तो मस्तिष्क का वह भाग सक्रिय होता है जो संतुलन और विवेक से जुड़ा है। यही प्रक्रिया आत्म-मूल्यांकन कहलाती है। तभी मेरा माथा सच में “खनक” गया। मुझे पिताजी की वह बात याद आई, जो वे हर सत्संग में बार-बार कहते हैं ‘रात को सोने से पहले सिर्फ पाँच मिनट अपने बारे में सोचा करो।
दिनभर में मैंने क्या अच्छा, क्या बुरा किया। अच्छे को साथ लेकर चलो व बुरा छोड़ते चलो। स्वयं मूल्यांकन किया करो। तुम खुद जान जाओगे कि दिन में कहाँ सही थे और कहाँ सुधार की जरूरत है। तुम्हें एहसास होगा कि तुमने किसका बेवजह दिल दुखाया, सिर्फ ईर्ष्या से किसकी निंदा या चुगली की, किससे ठगी की। एक सत्संगी को केवल पाँच मिनट के सुमिरन के बाद किया गया यह आत्मचिंतन अपनी हर कमी और गलती का सौ प्रतिशत एहसास करा देता है।
इसके बाद किया गया सुमिरन उन गलतियों का पश्चाताप और फल भी समाप्त कर देता है, और आत्मा फूलों की तरह हल्की हो जाती है।” धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आया कि आत्म-मूल्यांकन कोई आधुनिक खोज नहीं है। यह हमारे धर्म, हमारी परंपराओं और संतों की शिक्षाओं का मूल रहा है। फर्क केवल शब्दों का है पहले इसे ‘आत्मचिंतन’ कहा जाता था, आज इसे ‘सैल्फ इवैल्यूऐशन’ कहा जाता है। धर्म हमेशा यही सिखाता आया है कि बाहर की दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर झाँको। संतों ने बार-बार समझाया कि दुख की जड़ परिस्थितियाँ नहीं, हमारी सोच है।
आज यह अनुभव सांझा करने का उद्देश्य केवल एक कहानी कहना नहीं, बल्कि यह बताना है कि हर उदासी का कारण कोई बड़ा दु:ख नहीं होता और हर समस्या का समाधान बाहर से ही नहीं मिलता। बल्कि अपने-आपका मूल्यांकन करने अर्थात् अपने विचारों का सच डालने की जरूरत होती है। मेरी उदासी परिस्थितियों की देन नहीं थी, बल्कि मेरी आदतों का परिणाम थी और आदतें बदली जा सकती हैं बस स्वयं को देखने, स्वीकार करने और सुधारने का साहस चाहिए।
जब हम, दूसरों का मूल्यांकन जो इंसान के दुखी रहने का सबसे बड़ा कारण होता है-छोड़कर आत्म-मूल्यांकन शुरू करते हैं, तभी जीवन में वास्तविक शांति का प्रवेश होता है। उम्मीद है कि आप सुबह और शाम हजूर पिता जी शिक्षा अनुसार सिर्फ अपने लिए पाँच-पाँच मिनट निकालकर, सोच के गहरे भँवर से अर्थात कमियों को बाहर निकालने के इस तरीके को जरूर अपनाएंगे।

































































