Experiences of Satsangis …चल गुड़ खा ले’ -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर
जीएसएम सेवादार रेशम सिंह इन्सां पुत्र सचखंडवासी मुख्यत्यार सिंह पैतृक गाँव रूड़े के कलां जिला बरनाला हाल आबाद गाँव शाह सतनाम जी पुरा जिला सरसा से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की रहमतों का कुछ इस तरह से वर्णन करते हैं:-
सन् 1975 की बात है कि सतगुरु जी ने मुझ पर रहमत करके मुझे नाम शब्द बख्श दिया। पहले मुझे शराब पीने की आदत थी जो नाम लेते ही छूट गई और मुझे नाम की खुमारी का नशा रहने लगा। सतगुरु जी ने ऐसा नशा चढ़ा दिया कि मेरा घर में अब दिल लगना कम हो गया। जब भी मेरे तड़प उठती तो मैं सत्संग सुनने के लिए सरसा दरबार की तरफ चल पड़ता। कई बार घर वाले किराया न देते तो मैं पैदल ही निकल पड़ता।
एक बार ऐसे ही मैं पैदल ही घर से सरसा की तरफ चल पड़ा। उस दिन मैंने कुछ भी खाया-पिया नहीं था और न ही मेरे पास कोई पैसा था। जब मैं मानसा के नजदीक पहुंचा तो मुझे एक अजनबी भाई मिला। वह मुझसे कहने लगा कि चाय पीनी है? मैंने कहा कि नहीं पीनी। फिर कहने लगा कि चल गुड़ खा ले, अपना कुल्हाड़ा है। वह मुझे अपने कुल्हाड़े पर ले गया और उसने मुझे पेटभर गुड़ खिलाया। मैंने रास्ते में थोड़ा आराम किया और अगले दिन मैं गाँव पनिहारी के पास पहुँच गया। अब मुझसे चलना मुश्किल हो गया था।
मेरी टाँगें दर्द करने लगी थीं। मैं थोड़ा आराम करने के लिए एक जगह पुली पर बैठ गया। वहाँ बैठे-बैठे मुझे इस तरह महसूस हुआ कि जैसे मेरी टाँगों पर गर्म रूई से सेंक दिया जा रहा है। मेरी टांगों का दर्द गायब हो गया। मुझे बड़ा आराम मिला और मैं फिर से चलने लायक हो गया। उस दिन मैंने सरसा दरबार पहुँच कर सतगुरु जी के खूब दर्शन किए व सत्संग सुना। मैंने अपने सतगुरु जी का बड़ा शुक्राना किया क्योंकि मुझे भूख लगने पर गुड़ खिलाकर मेरी भूख मिटाई और फिर मेरी टांगों के दर्द से मुझे राहत दिलवाई। यह सब करने वाला मेरा सतगुरु ही तो था।
उन्हीं दिनों की बात है, मैं एक नया ऊँट खरीद कर लाया था। उस दिन शनिवार था और शाम के करीब तीन-चार बजे का समय था। ऊँट की सौदेबाजी में मुझे याद नहीं रहा कि इस शनिवार-रविवार को सत्संग है। मेरी माँ मुझे कहने लगी कि तूने सत्संग पर नहीं जाना? मैंने कहा कि जाना तो है।
वह कहने लगीं कि मैं रोटी पका देती हूँ, तूं चला जा, क्योंकि उसे यह डर था कि मैं फिर से कहीं शराब पीने न लग जाऊं। मैं रोटी खाकर चल पड़ा लेकिन मानसा तक अंधेरा हो गया और मुझे वहीं रूकना पड़ गया। एक बस वाले के कहने से मैं उसकी बस पर तिरपाल बिछाकर बैठ गया। मेरे मन में अत्यधिक तड़प लग गई कि मैं सत्संग पर नहीं पहुँच सका, सत्संग सुनने से रह गया। मैं सुमिरन करने लग गया। मुझे बैठे-बैठे एकदम एक रोशनी दिखाई दी तथा सत्संग का सारा कार्यक्रम दिखाई देने लगा। वो सरसा दरबार में हो रहा था। मैं सत्संग पंडाल में शाही स्टेज के नजदीक बैठा हुआ था।
मैंने पूरा कार्यक्रम सुना। परमपिता जी के दर्शन करके तथा सत्संग सुनकर मैं निहाल हो गया। इतने में सुरज का हल्का-हल्का प्रकाश शुरू हो चुका था। मैं वहाँ से बस चढ़कर सरसा दरबार पहुँच गया। दरबार में मुझे गाँव सिलवाला का प्रेमी बहादुर सिंह मिला। वह मुझे कहने लगा कि मैंने तुझे रात बुलाया (आवाज दी थी) था, तू बोला क्यों नहीं। मैं तेरे पास ही बैठा था। मैं चुप रहा, क्योंकि यह राज की बात थी। मैंने उसे कहा कि मैं तो अब आया हूँ।
परंतु उसने मेरी बात का विश्वास नहीं किया। मैं सोच रहा था कि तू भी अपनी जगह ठीक है क्योंकि मुझे परमपिता जी ने सत्संग पंडाल में बैठाकर सत्संग सुनाया था। इसी प्रकार मेरे साथ अनेक करिश्में हुए व हो रहे हैं। मुझे सतगुरु परमपिता जी पर इतना विश्वास हो गया कि मैं घर-बार, दुनियादारी सब कुछ छोड़ कर दरबार में बतौर जीएसएम सेवा करने लगा। मेरी पूज्य हजूर पिता जी के चरणों में यही अरदास है कि इसी तरह सेवा-सुमिरन करते-करते मेरी ओड़ निभ जाए जी।
































































