Shabari: प्रेम दीवानी शबरी की अमर कहानी
‘शबरी’ एक ऐसा नाम जो अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाली हस्तियों में एक विशेष पहचान रखता है। प्रभु भक्ति में लीन शबरी प्रभु श्री राम को पाकर अमर हो गई। ऐसा अमरत्व हर किसी के नसीब में नहीं होता। शबरी भील समुदाय से संबंध रखने वाली एक अबोध कन्या थी। उसका पिता एक बहुत बड़े कबीले का सरदार था। घने जंगलों में बसने वाला यह कबीला बेहद हिंसक था।
जानवरों की बलि देना, उनका शिकार करना व उन्हें मारकर खा जाना इनका मुख्य पेशा था लेकिन शबरी अपने समुदाय के लोगों व अपने हमउम्र बच्चों से अलग थी। जहाँ अन्य बच्चे भी जानवरों को मारने में खुश होते, शबरी ऐसा देख दु:खी हो जाती थी। उनके विपरीत वो उन्हें प्यार करती, घायलों को मरहम-पट्टी करके पशु परिंदों की सेवा करती। वो जब कुछ बड़ी हुई तो उसके घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी। अब उसकी शादी की तैयारियाँ हो चुकी थी। कबीले का सरदार होने के नाते उसके पिता ने बहुत सारे जानवरों को अपने घर पर बांध रखा था, जो अगले दिन आने वाले लोगों के लिए मार दिए जाने थे। शबरी उन जानवरों के बीच गई और उन्हें सहला रही थी, लाड़-प्यार कर रही थी।
इसी दौरान उनका एक नौकर वहाँ आया, तो शबरी ने उससे पूछा कि इतने सारे जानवर क्यों ला रखे हैं? उसने बताया कि कल आपकी शादी है और आने वाले मेहमानों के लिए सरदार की ओर से ये इंतजाम किया गया है। यह सुनकर शबरी घबरा गई। वो फिर बोली, अगर मेरी शादी कल न हो तो क्या ये नहीं काटे जाएंगे? उस नौकर, चरवाहे ने कहा कि हाँ, फिर तो ये बच जाएंगे लेकिन कब तक! एक दिन तो आपकी शादी होनी ही है ना! शबरी को इस बात से बड़ी ठेस पहुँची।
शबरी अभी छोटी उम्र की थी और भील छोटे बच्चों की ही शादी कर दिया करते थे।
शबरी का मन निर्मल था। उसने सोचा कि मेरी शादी पर इतने जानवर काटे गए तो यह बहुत बड़ा पाप होगा। मैं शादी ही नहीं करवाउंगी। यह सोचकर वह उसी रात घर से चली गई। अंधेरे व घने जंगलों में उसे भी नहीं पता वो किधर व कहाँ जा रही है। बस उसे तो यही था कि मैंने निरीह जानवरों को मरने से बचाना है। वह बहुत दूर निकल गई। वह जंगलों में लुकी-छिपी रहती ताकि घरवाले कहीं फिर से उसे ले न जाएं।
कई दिनों के बाद वह रात को एक ऋषि के आश्रम पहुँच गई। उसने देखा कि कुछ सो रहे हैं और कुछ लोग ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। वहाँ का वातावरण उसे भक्ति भाव से खिला हुआ लगा। उसे नहीं पता था कि यह मतंग ऋषि का आश्रम है। महामुनि ऋषि मतंग एक महान तपस्वी थे। शबरी ने वहीं रहने का मन बना लिया लेकिन यहाँ तो सभी पुरुष थे। जब सुबह की भोर से वहाँ चहल-पहल हुई तो वह भाग गई कि कोई उसे देख न ले। ऋषि परम्परा के अनुसार वहाँ महिलाओं का प्रवेश मना था। वह इस बात से डर गई कि ऋषि उसे कोई श्राप न दे दें।
वह दिन में कहीं छिपी रही और रात के अंधेरे में फिर आ गई और आश्रम में साफ-सफाई करके यज्ञ की लकड़ियाँ आदि रख के सुबह होने से पहले फिर चली गई। ऋषियों ने देखा तो दंग रह गए कि यह कौन कर गया! वो इसी प्रकार हर रोज करने लगी लेकिन किसी को दिखाई न देती। आश्रम के सब लोग बड़े हैरान थे कि रोज-रोज कौन ऐसा कर रहा है! वो देखते कि आश्रम की सफाई की होती है। बर्तनों में पानी भरा होता है। हवन के लिए लकड़ियाँ रखी होती हैं लेकिन ऐसा करने वाला आज तक नज़र नहीं आ रहा। कुछ महीने इसी प्रकार बीत गए। शबरी रात को आती और सब कुछ करके किसी के उठने से पहले ही चली जाती। अब उसका मन इस सेवा में रच-बस चुका था।
वो तो अपनी सेवा में मस्त थी। उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं था। आखिर एक दिन महर्षि मतंग ने उसे देख लिया और बोले कि देवी आप कौन हैं, जो इस प्रकार यह सेवा निभा रही हैं? आप मेरे सामने आओ! छिपने की जरूरत नहीं है! देवी डरो मत! जो भी हो, सामने आओ! महर्षि के कहने पर वह आ गई और बोली कि महात्मन! मैं भील समुदाय से हूँ और शबरी कुल से हूँ। मैं भी भक्ति-मार्ग से जुड़ना चाहती हूँ लेकिन स्त्री होने के नाते व भील समुदाय से होने के कारण मैं डरी हुई थी कि मुझे कहीं कोई जगह मिलेगी भी या नहीं। मतंग ऋषि उसकी इस पीड़ा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी प्राचीन परम्परा को तोड़ते हुए उसे अपने आश्रम में जगह देने का वचन दे दिया।
वो बोले कि शबरी, तुम मेरी बेटी हो! तुम इस आश्रम में एक बेटी, एक भक्तिन की तरह नि:संकोच रह सकती हो। तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। तुम्हें यहाँ कोई कुछ नहीं कहेगा। यहाँ सेवा करो और अपनी भक्ति करो। इसके बाद वह उस आश्रम में रहने लगी और वह राम-नाम में ऐसी लगी कि उसे राम के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। वह उसी प्रकार राहों को संवारती। उन पर फूल बिछाती। अपने राम के आने का इंतजार करती लेकिन अन्य ऋषि-मुनि उससे चिढ़ने लग गए और उसको बुरा-भला भी कहते। महर्षि मतंग के पास भी इसकी शिकायत होने लगी परंतु महर्षि उसके भक्ति-भाव से परिचित थे। वे समझते थे कि जहाँ अन्य सिर्फ राम-राम ही करते हैं, उसके लिए तड़प नहीं है, जबकि यह भीलनी राम जी की सच्ची उपासक है और इसकी निरोल भक्ति उच्च दर्जे की है।
जब महर्षि मतंग व्योवृद्ध हो गए, तब अपने अंतिम समय को देखते हुए उन्होंने शबरी को समझाते हुए कहा कि शबरी, मेरे स्वर्ग जाने के बाद तुमने यहीं रहना है। कहीं मत जाना। ये जो दूसरे लोग हैं वो भटकते रहेंगे। उन्हें कभी राम के दर्शन नहीं होंगे, जबकि तेरे को मिलने राम एक दिन यहीं आएंगे। कुछ दिनों के बाद महर्षि मतंग स्वर्ग-सिधार गए। श्री राम का इंतजार करते हुए शबरी अपने भक्ति के मार्ग पर दृढ़ता से चलती रही। बड़े ऋषि-मुनि आते। उसके फूलों को कुचल जाते। उसको ताने-उलाहने देते। उसे पागल कहते लेकिन शबरी अपने मार्ग से टस से मस न हुई।
शबरी अब बुजुर्ग हो चली थी। आज के अनुसार कहें तो 15-16 वर्ष से वह 80-85 वर्ष की हो चुकी थी भक्ति मार्ग पर चलते हुए। श्री राम के लिए वही तड़प, वही वैराग्य और उसके आने का विश्वास एक क्षण भी कम नहीं हुआ जबकि ऋषि-मुनि उसे यह कहकर चिढ़ाते कि हे पगली, तेरा दिमाग खराब हो गया है! राम कभी नहीं आएंगे। तू ऐसे ही मर जाएगी। जब वो ऐसा सुनती, वो जोर-जारे से रो पड़ती कि नहीं-नहीं, मेरे राम आएंगे। जरूर आएंगे। तुम मेरे फूलों को कूचलो मत! मेरे भगवान जरुर आएंगे!
पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि शबरी का प्रेम एक अमर कहानी है। उसके दिलो-दिमाग पर प्रभु के सिवा कोई नहीं है। उसकी प्रीत, वैराग्य दिनों-दिन बढ़ता गया। ईर्ष्यालु लोग उसे जितना तंग-परेशान करते, उसका विश्वास उतना ही मजबूत होता गया। उसका प्रेम उतना ही निखरता गया और वह प्रभु के करीब पहुंचती गई। उसके इतने दृढ़-विश्वास तथा अनमोल प्यार व तड़प को देख भगवान भी द्रवित हो गए। आखिर एक दिन श्री राम उसकी कुटिया में चल आए। शबरी राह पर फूल बिछा रही थी।
जब उसने अपने सामने श्री राम को देखा तो वह मतवाली हो गई। अपने होशो-हवाश खो बैठी। वो गुणगान गाने लगी। मेरे राम तुम आ गए। हे मेरे प्रभु, तुम आ गए। मुझ गरीबनी के घर। आओ मेरे भगवन! आओ। तुम्हें प्यास लगी होगी! लो जल ग्रहण करो! फिर वो बेर लेकर आई। मेरे भगवान, आपको भूख भी लगी होगी! लो, मैं आपके लिए जंगल से बेर लेकर आई हूँ। वो इतनी मस्त हो गई कि श्री राम जी को अपने जूठे बेर खिलाने लगी।
वह प्रेम में पागल थी। उसे यही लगा कि मेरे प्रभु को कोई बेर कड़वा न चला जाए। वह बेर को थोड़ा-सा चखे और मीठे स्वाद वाला बेर श्री राम को दे दे। श्री राम को ये बेर इतने स्वादिष्ट और मिठास भरे लगे कि दुनिया का कोई पकवान इन जूठे बेरों के बराबर न था।
पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि कोई शबरी बने तो जाने कि प्रभु प्रेम क्या होता है और प्रभु-प्यार को कैसे पाया जाता है। दुनिया के तानों-उलाहनों की परवाह किए बगैर शबरी की तरह कोई चले तो भगवान दर्शन देने चले आते हैं।



































































