MSG Avatar Divas: जी सतगुरु प्यारे आ गए
रामायण का एक प्रसंग है। जब सीता जी की खोज़ में लंका जाने की बात हुई, तो सुग्रीव व उनकी सेना इसकी तैयारियों में जुट गई। मगर सबसे बड़ा सवाल यह था कि एक बार कोई लंका में जाकर सीता जी से मिलकर उनके बारे कोई जानकारी तो लेकर आए क्योंकि लंका समुद्र के उस पार सौ योजन दूर थी और इसे कोई पार कैसे कर सकता था। सभी के हाथ खड़े हो गए। फिर उस सभा में जामवंत ने सलाह दी कि इस काम को हनुमान जी कर सकते हैं।
वो हनुमान जी के पास गए। उनसे बोले कि आपने समुद्र को एक छलांग में पार करके लंका जाना है। हनुमान जी सुनकर चुप खड़े रहे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि मैं ये कैसे कर सकूंगा! जब उनको खामोश देखा तो जामवंत बोले कि हे अंजनी नंदन! तुम्हें कुछ याद है? हनुमान जी ने ना में सिर हिलाया। जामवंत फिर बोले कि हे बलवीर! तुम याद करो! तुम्हारे में बहुत बल है। तुम महान हो, अतुलनीय हो। तुम्हारा जन्म ही राम काज के लिए हुआ है।
यह श्री राम जी का ही काज है और तुम अपनी ताकत को जगाओ। अपने भीतर देखो। तुम्हारे अंदर बहुत शक्ति है। जामवंत ने जब उन्हें याद करवाया, तो हनुमान जी को अपनी वो सब शक्तियां याद आ गई और उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया। उनका इतना बड़ा विराट रूप जो उन्हें भी शायद पता नहीं था। ऐसा देख सब चौंक गए। बस जैसे ही वो शक्तियां जागृत हुई तो हनुमान जी उस विशाल समुद्र को पार कर लंका पहुँच गए।
इसी प्रकार यह संसार भवसागर है, जिसे हमने पार करके जाना है और यह अपने आप हो नहीं सकता। मनुष्य का जन्म मिला ही इसलिए है, लेकिन बिना युक्ति के मुक्ति नहीं। मनुष्य देहाभिमान में रूह का ख्याल भूल जाता है। अपना देश, अपना मुकाम सब कुछ भूल जाता है। रूह युगों-युगों तक भटकती रहती है और अपनी मुक्ति के लिए पुकार उठती है। फिर संत-सतगुरु रूह की ऐसी हालत देख तरस खाते हैं। इन रूहों को इस आवागमन से पार करने वो खुद हम मनुष्यों की तरह इन्सानी मलमूत्र वाली देह को धारण करके मातलोक में आते हैं।
जिस प्रकार आम मनुष्य धरा पर विचरण करते हैं, उसी प्रकार उनकी तरह ही संत-सतगुरु वही लिबास धारण करके उनके बीच रहकर उन्हें सब समझाते हैं। जो इन्सान भूल चुका है, उन भूली हुई रूहों को याद कराते हैं कि तेरा निजधाम सचखण्ड है। यह जो मानस की देह है ये असली नहीं है। इसमें किराए के मकान की तरह कुछ दिन ही ठहरना होगा। संतजन पूरा ठोक-बजाकर डंके की चोट पर इस सच्चाई का बखान करते हैं।
वो रूहों को अपने देश ले जाने की हर कोशिश करते हैं और जो रूहें उनकी बातों पर यकीन कर लेती हैं, उन्हें फिर वो अपने साथ निजधाम, सचखंड ले जाते हैं। रूहों की मुक्ति के लिए वो दिन-रात प्रयासरत रहते हैं। रूहों को अपने साथ जोड़कर उन्हें अपना नूरानी प्यार बख्शते हैं। अपने सतगुरु का प्यार पाकर ऐसी रूहें हर रजो गम से आज़ाद हो जाती है। सतगुरु के प्यार की खुमारी उन पर सदा चढ़ी रहती है।
खिल गए गुलशन चारों ओर, कण-कण भी मुस्काए,
वाली दो जहान आज चरण इस धरत पर टिकाए।
रोशन हुआ ज़र्रा-ज़र्रा और महका आलम सारा,
आ गया धरती पर दो जहाँ का सिरजनहारा।।
रूहों के लिए ऐसी ही खुमारी, रूहानी मस्ती का भण्डार लेकर आए हैं पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां। पूज्य गुरु जी इस धरा पर मुबारक 15 अगस्त 1967 को मानस के चोले में अवतार धार कर आए और आज देश-दुनिया को अपने रूहानी प्यार से नवाज रहे हैं। यह मुकद्दस दिन बड़ा भागों वाला है। धरा के भाग जाग गए! रूहों के वारे न्यारे हो गए! ऐसा शुभ आगमन कि बहारों के मेले लग गए! खुशियों के बादल उमड़-उमड़ कर आ गए।
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठा! पत्ता-पत्ता नाच उठा! पाक-दीदार कर रूहें मस्त हो गई! मस्ती भरे समुद्र छलक पड़े और नाचती, गाती, इतराती रूहें दीवानी हो गई! उनकी दीवानगी ऐसी कि उनके लिए सिर्फ सतगुरु ही सब कुछ है। उसका दीदार, उसका प्यार ही ज़िंदगी बन गई है! यही चाहत है! यही लगन है! यही शौंक बन गया है! यही दिल से दुआ है, हमें ज़िंदगी देने वाले, जीने का पाठ सिखाने वाले प्यारे सतगुरु को यह शुभ दिन 15 अगस्त बहुत-बहुत मुबारक हो! इसकी खुशियां सबके लिए दून सवाई हों!
पावन जीवन की झलक:
पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने 15 अगस्त 1967 को श्री गुरुसर मोडिया जिला श्री गंगानगर (राज.) में आदरणीय पिता नम्बरदार सरदार बापू मग्घर सिंह जी व आदरणीय माता नसीब कौर जी के घर अवतार लिया। आप जी के आदरणीय पिता सरदार मग्घर सिंह जी गाँव के नम्बरदार रहे हैं और गाँव के मौजिज व्यक्तियों में उनका नाम शामिल था। पूरे गाँव को ही आदरणीय माता-पिता से अपार स्नेह था क्योंकि यह गाँव आप जी के पूर्वज़ों द्वारा ही बसाया गया है। इसलिए आप जी के घर-परिवार के प्रति गाँव वासियों का एक विशेष सम्मान रहा है।
आदरणीय बापू जी व माता जी भी हर किसी के प्रति हमदर्दी की भावना रखते हुए उनके हर दु:ख-सुख में शरीक होते। उनका लोगों के प्रति प्यार ही था कि किसी को कोई भी जरूरत होती, वह नि:संकोच उनके पास अपनी बात रखता और उनसे मदद पाकर निहाल हो जाता। यही नहीं, गाँव में होने वाले हर कार्य के लिए आदरणीय बापू जी से सलाह-मशविरा लेकर ही शुरु किया जाता। हर कोई आदरणीय बापू जी को नम्बरदार साहिब कहकर ही संबोधित करता। गाँव के नम्बरदार व बहुत बड़े जमींदार होते हुए बापू जी अति विनम्र व नेक दिल इन्सान थे।
पूजनीय बापू जी व माता जी के यहाँ किसी चीज़ की कमी न थी। बहुत बड़ा घराना, साधन-सम्पन्न व हर सुख-सुविधा से भरपूर घर-परिवार में आदरणीय बापू जी व माता जी को बेशक कोई कमी न थी, लेकिन यह बात उनको जरूर परेशान करती कि काश! उनके भी यहाँ कोई संतान हो। क्योंकि बिना संतान इतना बड़ा घराना होते हुए भी उनके मन में चिता तो रहती थी, जिससे वो बेचैन भी हो जाते। आदरणीय बापू जी जब ज्यादा बेचैन हो जाते तो अपनी इस बात को गाँव के संत त्रिवेणी दास जी के सम्मुख रख देते। फिर संत त्रिवेणी दास जी आदरणीय बापू जी को यह कहकर हौसला बढ़ाते कि कोई बात नहीं आपके घर भी बच्चा होगा और वो कोई ऐसा-वैसा नहीं होगा।
उम्मीद भरे ये शब्द सुनकर आदरणीय बापू जी की सब चिंता मिट जाती, क्योंकि गाँव के संत त्रिवेणी दास जी का आदरणीय बापू जी के साथ विशेष लगाव था। आदरणीय बापू जी व माता जी साधु-संतों की खूब सेवा किया करते। उनके घर जो भी साधु-संत आता कभी खाली नहीं गया। धर्म-कर्म के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी। घर में जब भी अवसर मिलता साधुजनों के समागम व कीर्तन अक्सर करवाए जाते और आए हुए अतिथियों की भरपूर सेवा की जाती और उन्हें खूब दान-दक्षिणा दी जाती। संतान सुख के लिए संत त्रिवेणी दास जी ने बड़े दावे के साथ कहा कि पुत्ररत्न की प्राप्ति जरूर होगी।
संतान सुख की चाह में आदरणीय बापू जी व माता जी के अठारह वर्ष बीत गए। इतने लम्बे अरसे तक का इंतज़ार उनके लिए असहनीय था, लेकिन ईश्वर में आस्था के चलते उनका मन कभी कमजोर नहीं हुआ और उन्होंने उम्मीद का दामन थामे रखा। आखिर उनकी ज़िंदगी का वो नसीबों वाला दिन भी आ गया, जिसके लिए अठारह वर्षों तक उन्होंने इंतज़ार किया। मुबारक 15 अगस्त 1967 को पूज्य गुरु जी ने अवतार धारण किया। रूहानी खुशियों को लाने वाला यह दिन नूरानी प्रकाश से भर गया। नूर-ए-दीप की गुलज़ार खिल गई।
आदरणीय नम्बरदार साहिब के घर खुशियों के मेले लग गए। जिसने भी सुना कि नम्बरदार जी के घर लाल ने जन्म लिया है, वो खुशियाँ मनाने दौड़ा चला आया। घर में बधाइयाँ देने वालों का तांता लग गया। पूरे गाँव में शक्कर के थाल भर-भरकर बांटे गए। खूब पकवान बनाए गए और आने वालों की पूरी सेवा की गई। इस खुशखबरी को सुनकर कई साधुजन भी घर में आए और इन असीम खुशियों को हासिल किया।
इन्हीं खुशियों में शामिल होने गाँव के संत त्रिवेणी दास जी भी आए। उन्होंने बापू जी को बधाईयां दी और कहा कि भाई भगतो! आपके घर कोई ऐसा-वैसा पुत्र नहीं आया। ये ईश्वरीय स्वरूप हैं। इन्हें बड़े लाड़-प्यार से रखना। समय आने पर इसकी हस्ती का आपको पता चल जाएगा। ये आपके पास 23 वर्ष तक ही रहेंगे और इसके बाद अपने जिस मकसद के लिए ये आए हैं, उसे पूरा करने चले जाएंगे।
देखो 15 अगस्त की तारीख है कैसे खुद पर इतराई,
पूछने पर क्या खूब बात इसने बताई।
क्यूँ ना इतराऊँ मैं,
खुद खुदा रब्बी जोत चल इस दिन धरती पे है आई।।
संत-सतगुरु अपनी अथाह गैबी ताकतों के साथ अवतार धारण करते हैं, लेकिन क्या मजाल कि किसी को अपने इस भेद के बारे कुछ भी ज़ाहिर कर दें। हाँ, इतना जरूर है कि जो संस्कारी जीव होते हैं या जो संतों की सोहबत में रहे, उन्हें इसका अहसास जरूर हो जाता है। पूज्य गुरु जी की रूहानी ताकत का अहसास लोगों को बाल्यकाल अवस्था से हो गया था। पावन बचपन का अलौकिक प्यार हासिल करने वाले इतना तो जान चुके थे कि यह बालक अद्भुत गुणों का स्वामी है।
एक बार का जिक्र है कि आपजी के आदरणीय ताया जी एक बहुत बडेÞ पहलवान थे।
वो बहुत सख्त प्रैक्टिस किया करते थे। कई-कई दंड पेलना और कुश्ती लड़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। रोज़ाना की तरह एक दिन जब वो प्रैक्टिस कर रहे थे तो पूज्य गुरु जी भी वहीं पर आ गए। आपजी उस समय 4 वर्ष के थे। आपजी ने आदरणीय ताया जी को देखा कि वो दण्ड पेल रहे हैं और बीच में रुककर घी पीकर फिर से प्रैक्टिस में लग जाते हैं। आदरणीय ताया जी पै्रक्टिस में मस्त थे और आपजी उनका रखा हुआ घी पी गए जो तीन पाव के लगभग था। आदरणीय ताया जी जब घी पीने आए तो देखा घी वाला बर्तन खाली था। उनको यकीन नहीं था कि घी आप जी पी गए होंगे।
लेकिन आप जी के सिवा वहाँ कोई और नहीं था। जब उन्होंने आपजी से पूछा तो आपजी ने बताया कि घी मैंने पी लिया है। यह सुनकर ताया जी हैरान रह गए। उन्होंने पूरा दिन आपजी का ध्यान रखा कि कहीं इन्हें कुछ हो न जाए, लेकिन आपजी सही सलामत उसी प्रकार अपनी बाल-क्रिड़ाओं में मस्त रहे। फिर आदरणीय ताया जी बापू जी के पास आए और उन्हें बताया कि ये कोई आम बच्चा नहीं है। यह तो बड़ा होकर कोई बड़ा पहलवान बनेगा।
एक बार आदरणीय बापू जी आपजी को अपने कंधों पर बैठाकर खेतों के चक्कर लगा रहे थे। उस समय आप जी करीब 4 वर्ष के थे। आदरणीय बापू जी जब खेतों में घूम रहे थे तो एक जगह पर आपजी की निगाह गई। आपजी ने उस जगह की ओर अपनी उंगली का इशारा करते हुए बापू जी से कहा कि बापू जी, यहाँ पर अपना सांझा खलिहान हुआ करता था न? अपने नन्हें लाडले के मुख से इतनी बड़ी बात सुनकर आदरणीय बापू जी सोच में पड़ गए कि इनको कैसे पता चला क्योंकि ये खलिहान तो बहुत वर्ष पहले हुआ करते थे और तब पूज्य गुरु जी का जन्म भी नहीं हुआ था।
आदरणीय बापू जी ने अपने लाडले के इस जिज्ञासा भरे सवाल का हाँ में उत्तर दिया और उन्हें अहसास हो गया कि वाकई ये ईश्वरीय स्वरूप हैं। ट्रैक्टर चलाने में तो आप जी छोटी आयु में ही माहिर हो गए थे। उस जमाने में दूर-दूर तक लोगों के पास ट्रैक्टर नहीं होते थे, लेकिन आप जी ट्रैक्टर को इतना बाखूबी चलाते कि देखने वाले दाँतों में उंगली डाले खड़े-खड़े देखते रह जाते। आप जी 7-8 साल के रहे होंगे, जब ट्रैक्टर से खेत जोतने लगे थे। जब आप जी ट्रैक्टर लेकर आते तो लोग सोचते कि ट्रैक्टर बिना किसी ड्राईवर के अपने-आप आ रहा है, लेकिन जैसे ही पास से आप जी ट्रैक्टर लेकर गुज़रते तो लोग यही कहते रह जाते कि नम्बरदार का लड़का कुछ हटकर ही है! ऐसा बालक कभी किसी ने देखा-सुना नहीं है!
एक बार पूज्य गुरु जी आदरणीय माता जी के साथ बस में कहीं जा रहे थे। उसी बस में एक साधु भी सफ़र कर रहा था। वह आप जी को काफी समय से निहार रहा था। माता जी ने देखा तो सोचने लगीं कि पता नहीं, ये मेरे लाडले की तरफ क्यों टकटकी लगाए हुए है! फिर वह अपनी सीट से उठकर आप जी के पास आ गया। वह माता जी से कहने लगा कि मैं इनको वैसे ही नहीं देख रहा। ये ईश्वरीय स्वरूप हैं। मैं इनका काफी समय से इंतज़ार कर रहा था और मैंने इन्हें कुछ देना है। इतना कहते हुए उसने अपनी एक धार्मिक पोथी निकाली और आप जी को सौंपते हुए कहा कि यह आपके लिए ही थी। मेरा काम अब पूरा हो गया। यह करिश्मा माता जी के लिए छोटा नहीं था क्योंकि एक अनजान साधुजन द्वारा बालक रूप पूज्य गुरु जी को इस प्रकार पोथी सौंपना किसी बड़े मकसद की ओर ईशारा था।
आप जी उस वक्त 5-6 वर्ष के थे, जब गुरुमंत्र हासिल किया। आप जी आदरणीय बापू जी के साथ 25 मार्च 1973 को नाम-शब्द लेने डेरा सच्चा सौदा शाह मस्ताना जी शाह सतनाम जी धाम सरसा आ गए। उस दिन नाम-शब्द का प्रोग्राम तेरावास व सचखंड हाल के बीच वाले पण्डाल में रखा गया था। आदरणीय बापू जी जब बैठने लगे तो भीड़ देखकर पीछे ही आप जी को लेकर बैठ गए। जब पूजनीय परमपिता जी आए और देखा कि आप पीछे ही बैठ गए हो, तो आप जी को आवाज़ लगाकर आगे बुलाया कि ‘काका अग्गे आ जा!’ आप जी को परमपिता जी के द्वारा इस प्रकार अपने पास बैठाकर नाम देना रूहानियत का गहरा राज़ ही था।
किसी को क्या पता था कि परमपिता जी अपने नूरानी वारिस को अपने पास बुलाकर नाम दे रहे हैं। प्यारे मुर्शिद का आप जी पर ऐसा रंग चढ़ा कि आप जी उनके ही होकर रह गए। लोगों की नज़र में जरूर आप जी बालक अवस्था में दिख रहे होंगे, लेकिन रूहानी प्यार की जो लहरें अंदर उठ रही थी, उन्हें कोई पकड़ नहीं सकता था। मुर्शिद के प्यार की झलक का एक छोटा-सा उदाहरण आप जी की बालक अवस्था से देखा जा सकता है।
एक बार पूजनीय परमपिता जी राजस्थान में सत्संग करने गए हुए थे। आप जी को पता चला कि परमपिता जी का सत्संग रखा गया है, जो श्री गुरुसर मोडिया गाँव के आस-पास ही था। आप जी उस सत्संग में स्वयं ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर गए, जिसमें काफी साध-संगत व नाम लेने वाले लोग भी थे। परमपिता जी ने आप जी को इतनी छोटी उम्र में इस प्रकार सेवा करते हुए देखा तो वचन फरमाए कि वाह भई काका! अपना इहो कम्म है। आपां इवें ही करदे रहना है। मुर्शिद प्यारे के मुखारबिंद से ऐसे अनमोल वचनों का अनायास निकलना बड़ा मायने रखता है।
जब भी संत-सतगुरु धरा पर अवतार धारण करते हैं, तो उनका मकसद बहुत बड़ा होता है। कलियुग के इस दौर में पूज्य गुरु जी का अवतार लेना पूरे देश, समाज व दुनिया के लिए महान परोपकार है। पूज्य गुरु जी कलियुग में अपनी संस्कारी रूहों के लिए ही मानस का चोला धार कर आए हैं। तपते-बलते इस भट्ठ में अपने पावन आशीर्वाद व कंवल कोमल चरणों की रज़ से जीवों को रूहानी ठंडक से बेपनाह सुकून प्रदान कर रहे हैं। हर कोई वारे-वारे है, बलिहारे है। ऐसे दौर में ऐसे महान सतगुरु का मिलन होना पूर्वले अच्छे कर्मों की बदौलत ही संभव है।
एक सुपर स्टार के पास है दिल हमारा,
जिसके पास है खुशियों का पिटारा।
1967 में जन्मे पर लगते हैं ये फॉरएवर-18
आया वो दिन जिसमें झूमता है जग सारा।
पूज्य गुरु जी महान प्रतिभा के धनी हैं। प्रतिभा भी ऐसी कि जो बड़ो-बड़ों को मुँह में उंगली डालने को मजबूर कर देती है और ऐसा नज़ारा अल्प आयु से ही देखने को मिल रहा है। आप जी का बाल्यकाल ऐसे अनगिनत नज़ारों से भरा है, जो अविश्वसनीय लगते हैं, लेकिन हकीकत को देख-सुनकर लोग हक्के-बक्के रह जाते हैं। पहले आप जी ने अपने शिशुकाल में नन्हें-नन्हें खेलों से लोगों को अभिभूत कर दिया और फिर बाल्यकाल में अपने नूरानी कौतुक से लोगों को सोचने पर मजबूर कर देते कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है।
इसके बाद जब आप जी ने जवानी की ओर कदम रखा तो आप जी ने अपने अलौकिक प्रकाश से दुनिया को जगमग कर दिया। उस समय आप जी मात्र 23 वर्ष की आयु में थे। इस छोटी सी उम्र में जब आप जी डेरा सच्चा सौदा के उत्तराधिकारी के रूप में दुनिया के सामने प्रकट हुए तो दुनिया के लिए यह एक कौतुहल भरा अचरज़ था। देश-दुनिया के कोने-कोने में जिसने भी यह सुना कि पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने श्री गुरुसर मोडिया के नम्बरदार बापू मग्घर सिंह जी के लाडले को अपना वारिस घोषित कर दिया है तो लोग आश्चर्यचकित रह गए। मात्र 23 वर्ष की आयु में रूहानियत के इतने बड़े पद पर सुशोभित होना लोगों को हैरान कर देने वाला नज़ारा था।
रूहानियत का यह दिलअज़ीज नज़ारा डेरा सच्चा सौदा के पावन इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया। आप जी की पावन रहनुमाई में डेरा सच्चा सौदा आज दिन दोगुनी रात चौगुणी नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
करना नि:स्वार्थ प्रेम सभी से सेवा का भाव सिखाया,
जिनके मार्गदर्शन में करोड़ों ने आत्मिक सुख को पाया।
मिटाकर भेदभाव सभी को एक साथ बिठाया,
ऐसे पूर्ण मुर्शिद-ए-कामिल का जन्म महीना आया।।
(विस्तार से सितम्बर अंक में देखें)


































































