Martyr Udham Singh: देश में नई चेतना जगाने वाले महान क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह
पंजाब की धरती ने अनेक ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिनकी वीरता की कहानियाँ आज भी देश के कोने-कोने में सुनाई जाती हैं। इन्हीं में शहीद ऊधम सिंह का नाम एक विशेष स्थान रखता है। वे स्वतंत्रता संग्राम के उन महान क्रांतिकारियों में से थे, जिन्होंने न केवल अत्याचारों को सहा बल्कि उनके विरुद्ध न्याय के लिए वर्षों तक संकल्पबद्ध रहे और अंतत: अपने प्रण को पूरा कर इतिहास रच दिया।
13 अप्रैल 1919, वैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा किया गया नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह काला अध्याय है, जिसने ऊधम सिंह की सोच और जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। उस दिन रोलेट एक्ट के विरोध में हज़ारों लोग शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित हुए थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा।
तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर के आदेश पर जनरल डायर ने बाग को चारों ओर से घेरकर निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। करीब एक हज़ार लोग इस बर्बरता में शहीद हुए। उस दिन नौजवान ऊधम सिंह भी वहीं मौजूद थे। उन्होंने घायल लोगों की मदद की और वहीं शहीदों की खून से सनी मिट्टी को उठाकर प्रतिज्ञा की- ‘मैं एक दिन इस नरसंहार का बदला जरूर लूंगा।’
ऊधम सिंह 1922 तक केन्या की राजधानी नैरोबी में रहे और वहाँ से लौटने के बाद वे डॉ. सैफुद्दीन किचलू और मास्टर मोता सिंह जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। 1924 में वे अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने गदर पार्टी की सदस्यता ली और लाला हरदयाल के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान देना शुरू किया।
अमेरिका में उन्होंने देशभक्त भगत सिंह से विचार सांझा किए और उन्हें अपना गुरु माना। 1927 में भगत सिंह के निर्देश पर ऊधम सिंह भारत लौटे और क्रांतिकारियों के लिए हथियार लेकर आए। पर हवाई अड्डे पर ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के समय उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये हथियार अंग्रेजों से लड़ने के लिए हैं और उनका उद्देश्य भारत को आज़ाद कराना है।
1932 में रिहा होने के बाद ऊधम सिंह लंदन जाने की योजना बनाने लगे। उनका एक ही लक्ष्य था, जलियांवाला बाग हत्याकांड के दोषी माइकल ओडवायर से बदला लेना। 13 मार्च 1940 को उन्हें वह मौका आखिरकार मिल गया। लंदन के कैक्सटन हॉल में एक सार्वजनिक बैठक चल रही थी, जिसमें ओडवायर और लार्ड जेटकिंस दोनों मौजूद थे। बैठक खत्म होते ही ऊधम सिंह ने अपनी पिस्तौल निकाली और ओडवायर पर गोलियाँ चला दीं। ओडवायर मौके पर ही मारा गया, जबकि जेटकिंस गंभीर रूप से घायल हुआ। यह काम करने के बाद ऊधम सिंह ने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि साहस के साथ अपनी गिरफ्तारी दी।
गिरफ्तारी के बाद उन पर मुकदमा चला, परंतु परिणाम पहले से ही तय था। कोर्ट में उन्होंने अपना नाम ‘राम मुहम्मद सिंह आज़ाद’ बताया जो भारत की धार्मिक एकता और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में गूंजा। उन्होंने निर्भीकता से कहा कि मैंने उन्हें वही सजा दी जिसके वे हकदार थे। मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है। 31 जुलाई 1940 को पेन्टनविले जेल में ऊधम सिंह को फांसी दे दी गई। उन्हें वहीं दफना भी दिया गया। यह समाचार जब भारत पहुंचा तो हर देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
केक्सटन हॉल की यह घटना केवल एक बदले की कार्रवाई नहीं थी, यह भारत की आत्मा के घाव पर एक स्रेह लेप था। जर्मन रेडियो ने भी इसे पीड़ितों की आवाज़, जो बंदूक की नाल से निकली कहकर प्रसारित किया। उनका यह कृत्य स्वतंत्रता संग्राम में आग की एक ज्वाला बन गई, जिसने पूरे देश में नई चेतना और आत्मगौरव का संचार किया। इसी ज्वाला ने 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऊधम सिंह जैसे योद्धा इतिहास में केवल नाम नहीं होते, वे विचार बन जाते हैं। उनका जीवन, उनका बलिदान और उनका साहस हर भारतीय युवा के लिए एक दीपक की तरह है, जो अन्याय के अंधकार में न्याय की लौ जलाने की प्रेरणा देता है। उनकी पुण्यतिथि पर हम सबको यह स्मरण करना चाहिए कि आज़ादी केवल एक उपहार नहीं थी, वह ऐसे ही महान बलिदानों का परिणाम थी।

































































