Children's Story

देशभक्त बालक -बाल कथा

सुबह से ही गांव में हलचल मची हुई थी। पहाड़ी पर स्थित गांव का हर एक व्यक्ति मानो एक-दूसरे से पूछ रहा था कि अब क्या होगा? ‘मां, क्या सचमुच अंग्रेज हमारे घरों में आकर लूटपाट मचाएंगे?’ 12 वर्ष के बालक बंता सिंह ने मां से पूछा।
‘पिताजी, क्या अंग्रेज हमें मार डालेंगे?’ मां से जवाब मिलता न देख बालक ने पिता से पूछा पर पिता भी चुप रहे। उनके चेहरे से दहशत स्पष्ट झलक रही थी।

‘नहीं, मैं अंग्रेजों को किसी भी कीमत पर गांव में नहीं आने दूंगा चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए,’ कहता हुआ वह बालक घर से बाहर अपने क्रांतिकारी चाचा के पास भागा जिनको साथियों सहित पकड़ने के लिए अंग्रेज गांव की ओर आ रहे थे।

खबर मिली थी कि अंग्रेज गांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर हैं। पहाड़ी रास्ता होने की वजह से अब उनकी चाल थोड़ी धीमी हो गई है। फिर भी वे एकाध घंटे में गांव में पहुंच जाएंगे, ऐसी संभावना थी। जब बंता सिंह चाचा के पास पहुंचा तो वह अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ उनसे लोहा लेने की योजना बना रहे थे। बालक चुपचाप खड़ा होकर उनकी योजना सुनने लगा।

देखते ही देखते गांव को अंग्रेज सिपाही घेरने लगे। चाचा के सारे साथी ऊंची जगहों पर छिप गए। दोनों ओर से गोलियां बरसने लगीं। एक ओर सैंकड़ों अंग्रेज थे तो दूसरी ओर केवल 8-10 आजादी के दीवाने। अंग्रेज सिपाही लुढ़कने लगे। क्र ांतिकारियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। होता कैसे क्योंकि वे पहाड़ी की ओट में ऐसे स्थानों से गोलियां चला रहे थे जहां से वे अंग्रेजों को देख सकते थे पर अंग्रेज उन्हें नहीं देख पा रहे थे।

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हारकर अंग्रेजों को पहाड़ी की खोह में शरण लेनी पड़ी। कुछ छिपते-छिपते नीचे मैदान की ओर भागे। सहसा अंग्रेजों की सहायता के लिए गोलाबारूद का जखीरा नीचे आ पहुंचा। अब तो वे पहाड़ी पर गोला दागते हुए, गोलियां चलाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। इस क्रम में 3 क्रांतिकारी शहीद हो गए।

कई घंटों की गोलाबारी के बाद क्र ांतिकारियों के पास धीरे-धीरे गोलियां कम होने लगीं। इससे उनकी चिंता बढ़ने लगी।
‘यदि किसी प्रकार अंग्रेजों के गोलाबारूद को नष्ट कर दिया जाए तो वे कमजोर पड़ जाएंगे,’ क्रांतिकारी चाचा ने कहा।
‘लेकिन यह होगा कैसे?’ सबने पूछा।

‘यह काम मैं करूंगा,’ सहसा पीछे से आवाज आई। आवाज बंता सिंह की थी। चाचा ने उसे देखा तो कहा, ‘अरे तू यहां क्या कर रहा है? जा, घर जा।’ पर वह न माना। बोला, ‘चाचाजी, शाम होने वाली है। अंधेरा छा जाने पर मैं उनके गोलाबारूद को नष्ट कर दूंगा।’ ‘नहीं बेटा, यह काम तुम्हारे बस का नहीं। तुम घर जाओ,’ चाचा ने उसे समझाया।

बालक जाने लगा पर उसने जाते-जाते कहा, ‘चाचा, बस कुछ देर और है, तैयार रहना, उनका गोलाबारूद नष्ट होने वाला है।’ धीरे-धीरे शाम हो आई। अचानक एक विस्फोट हुआ। विस्फोट इतना भयंकर था कि समूची पहाड़ी एकबार तो हिल गई। क्रांतिकारियों ने देखा कि पहाड़ी पर से बंता सिंह अंधेरे का फायदा उठाते नीचे बढ़ रहा है। जब वह गोलाबारूद के ऊपर वाली पहाड़ी के पास पहुंचा तो उसने अपने कपड़ों में आग लगा ली और ‘भारत माता की जय’ का घोष करते हुए गोलाबारूद के जखीरे में कूद गया।

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अंग्रेजों का सारा सामान व गोलाबारूद नष्ट हो गया। यह देख वे मैदान छोड़कर भागने लगे। भागते समय कई अंग्रेजों को क्रांतिकारी चाचा के साथियों ने ढेर कर दिया। इस तरह उस नन्हे बालक ने मातृभूमि पर अपना शीश चढ़ा कर अटूट देशभक्ति का परिचय दिया। उस देशभक्त बालक की इस शहादत पर सारा गांव नतमस्तक हो गया।
-नरेंद्र देवांगन

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