Independence Day: सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

बिस्मिल का मन इतना विस्तृत था कि वह हर समय बड़े-बड़े सपने देखा करते थे। एक तो हाईकोट में मुकदमा हो रहा था, उस की पैरवी की तैयारी यह कर रहे थे, दूसरे उन्हें चोरी से अपनी आत्मकथा भी लिखनी थी। थोड़ा-थोड़ा लिखा जाता और चोरी से बार्डर के हाथ ‘स्वदेश’ के दफ़्तर में भेज दिया जाता

दिन के बारह बजे जब संतरी बदल गए तो नए संतरियों ने बहुत ध्यान से फाँसी घर की कोठरियों को देखा। ताले देखे, जंगले देखे, फिर कैदियों की तरफ देखा। एक कोठरी खाली थी। बाकी तीन कोठरियों मे तीन फाँसी वाले बंद थे। पर उनमें से किसी ने भी आज खाना नहीं खाया था। उनका खाना मिट्टी के बर्तनों में ज्यों का त्यों रखा हुआ था। फाँसी वालों को मिट्टी के बर्तन इसलिए दिए जाते हैं कि वे धातु के बर्तनों से सिर न फोड़ लें!

रामदरस जमादार ने सुमेर जमादार से दृष्टि-विनिमय किया, फिर वे जाकर छोटे से हाते (दीवारों की बाड़) के दरवाजे पर बैठ गए। फाँसी घर के कैदियों ने खाना क्यों नहीं खाया था, यह दोनों जमादारों को अच्छी तरह पता था। आज सवेरे चौथी कोठरी में बंद कृपाल सिंह को फाँसी दे दी गई थी। इसी कारण फाँसी घर में यह मातम छा गया था। नंबर एक और नंबर तीन कोठरियों के रहने वालों की अपीलें खारिज़ हो चुकी थी।

रामदरस ने सुमेर से कहा—इनमें से कोई छूटने वाला नहीं। सुमेर को भी यहाँ ड्यूटी देते हुए महीनों हो गए थे, वह सबको अच्छी तरह जानता था। उदासीनता के साथ बोला कि जो जैसा करता है, वह वैसा भोगता है। बाकि… जाको राखे साइयाँ…। थोड़ी देर बाद रामदरस बोला कि आज तो सबको जैसे साँप सूँघ गया है। तुम बैठो, मैं इनको रोटी के लिए कहता हूँ। आखिर ये भी तो इंसान है, इन्हीं के साथ घंटो बैठना है। जो होगा, सो होगा, पर इस तरह खाना छोड़ने से क्या फायदा? जब तक साँस, तब तक आस।Swatantrata Diwas

फिर वह दरवाजे की तरफ चला गया। रामदरस ने झाँककर देखा और समझ गया कि चौथी कोठरी का निवासी आ रहा है। पर यह तो कोई गोरा-चिट्टा तेजस्वी व्यक्ति मालूम होता था। साथ में दो संतरियों के अतिरिक्त दो नंबरदार और स्वयं जेलर साहब थे। जेलर साहब के साथ-साथ वह छोटा-सा जुलूस फाँसी घर के हाते के दरवाजे पर आया। कहीं से बड़ा जमादार आ गया और उसने हाते का ताला खोला। सब लोग भीतर दाखिल हुए और फिर बड़े जमादार ने स्वयं भीतर आकर दरवाजे को ताला मार दिया।

दो नंबर कोठरी खोल दी गई। जो व्यक्ति इसके अंदर रहने के लिए आया था, वह कोठरी के दरवाजे तक आया, फिर सूँघ कर अधिकारी आवाज़ में बोला, ‘इसे साफ कराओ, इसमें बदबू आ रही है! फिनायल डलवाओ।’ यह कहकर उसने घूमकर अन्य तीन साथियों को बारी-बारी देखा और हँसा—हँसी के द्वारा ही उनका अभिवादन किया। सब फाँसी वाले उसे देखकर प्रफुल्लित हो गए। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि यह भी कोई फाँसी वाला था, पर था वह फाँसी वाला ही। ब्रिटिश सरकार तीन सौ अन्य फाँसी वालों को छोड़ सकती थी, पर इस रामप्रसाद बिस्मिल को नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि वह कई सालों से ब्रिटिश साम्राज्य को उलटने का षड्यंत्र कर रहा था।

फिर एक क्रांतिकारी आंदोलन भड़क उठा ‘काकोरी काण्ड’, जोकि 9 अगस्त 1925 को ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के क्रांतिकारियों द्वारा अंजाम दिया गया था। इस ऐतिहासिक ट्रेन डकैती का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का खज़ाना लूटकर हथियार खरीदना और स्वतंत्रता संग्राम के लिए धन जुटाना था। उस दौरान जाने कहाँ के दिलजले और सिर पर कफन बाँचे हुए लोग इकट्ठे हो गए और अब की विराट रूप में दल बनाकर क्रांति का आह्वान चला।

शचींद्रनाथ सान्याल, चंद्रशेखर आज़ाद, मुकुंदी लाल, दामोदर स्वरूप सेठ, सुरेश चक्रवर्ती, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशनसिंह, अशफाक उल्ला और जाने कितने ही अज्ञात नाम और अज्ञातधाम युवकों ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन कायम किया, जिस का उद्देश्य था क्रांति के द्वारा ऐसे समाज की स्थापना, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण संभव न रह जाए। अब तक इस फाँसी घर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं आया था।

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बड़े जमादार दौड़े, भंगी आया, सफैया आया, झाड़ वाला आया, झाड़ू आई, फिनायल आई और कोठरी की अच्छी तरह सफाई हुई जैसी कि शायद कभी नहीं हुई थी। सफाई होने के बाद बड़े जमादार ने कहा—’पंडित जी, तैयार हैं। बिस्मिल उठे, कमरे को अच्छी तरह देखा, फिर बोले—सूख जाने दो। वह फिर चहलकदमी शुरू करने ही वाले थे कि एकाएक उन का मन पसीज गया कि हैं ये अँग्रेजों के गुलाम, पर हैं तो अपने भाई, इन्हें क्यों कष्ट दें। वह एकाएक कोठरी के अंदर चले गए और भीतर जाते हुए बोले—लाओ मेरी पुस्तकें।

थोड़ी देर में कोठरी बंद हो गई। सब लोग चले गए, हाँ, दो और संतरी रह गए। पूरे फाँसी घर के लिए दो संतरी थे और अकेले रामप्रसाद बिस्मिल पर दो संतरी! जेलर को पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि बाहर से चंद्रशेखर आजाद तथा अन्य साथी काकोरी षड्यंत्र के फाँसी वालों को भगाने की चेष्टा कर रहे हैं। सब फाँसी वाले अपनी कोठरियों से अनुमान करने लगे कि पंडित जी क्या कर रहे हैं। थोड़ी देर में बिस्मिल चिल्ला-चिल्ला कर गीता के श्लोक गाने लगे, उसके बाद शायद यह समझकर कि यहाँ गीता के श्लोंको से लोगों को उतना लाभ नही पहुँचेगा जितना दूसरे गीतों से।

उन्होंने गाना शुरू किया—

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
सिर्फ मिट जाने की हसरत इक दिल-ए-बिस्मिल में है
रहरए राहे मुहब्बत रह न जाना राह में,
लज्जत-ए-सहारने नदी दरिएमणि में है।
ऐ शहीद सुरशेमिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरा हिम्मत की चर्चा गैर की महफिल में है।

सब लोग स्तब्ध होकर उनका गीत सुन रहे थे और सवेरे से फाँसी घर के हाते में जो मुर्दनी छाई थी, वह बात की बात में दूर हो गई थी। जमादार भी गौरव का अनुभव करने लगे कि अब कोई कैदी की तरह बंदी आया है। काकोरी मुकदमे के विषय में उन्होंने पहले ही सुना था और उन्हें मालूम था कि पंडित मोतीलाल नेहरू आदि की तरफ एक कमेटी बनी है जो इस मुकदमे की पैरवी कर रही है। वे यह भी जानते थे कि काकोरी के पास जो रेल डकैती हुई थी, उसी से यह मुकदमा चला है। बिस्मिल इसी षड्यंत्र के नेताओ में थे।

बिस्मिल का मन इतना विस्तृत था कि वह हर समय बड़े-बड़े सपने देखा करते थे। एक तो हाईकोट में मुकदमा हो रहा था, उस की पैरवी की तैयारी यह कर रहे थे, दूसरे उन्हें चोरी से अपनी आत्मकथा भी लिखनी थी। थोड़ा-थोड़ा लिखा जाता और चोरी से बार्डर के हाथ ‘स्वदेश’ के दफ़्तर में भेज दिया जाता और वहाँ क्रांतिकारियों के परम मित्र स्वयं अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के हाथों में पांडुलिपि पहुँच जाती। यह पुस्तक बाद में ‘काकोरी के शहीद’ नाम से प्रकाशित हुई, पर तुरंत ही जब्त कर ली गई।

लिखाई चलती रही, पर साथ ही जो तीन हतभाग्य उनके साथी बन गए थे, उनके लिए भी वह समय निकाल कर एक कार्यक्रम करते थे। वह स्वयं धार्मिक प्रवृति के थे और धर्म में उनका अगाध विश्वास था। इस बात को लेकर उनमें और कई साथियों में जो अभी पूरे निरीश्वरवादी तो नहीं हुए थे, पर उस ओर बढ़ रहे थे, बड़ी चखचख रहती थी, पर इन बेचारे फाँसी वालों को उन बातों को बताकर संशय में नहीं डालना था। वह उन्हें परलोक और परजन्म की बात समझाते थे और बताते थे कि यह जन्म सैंकड़ों अन्य जन्मों में एक है, मृत्यु तो इस प्रकार है जैसे एक कपड़ा बदलकर दूसरा पहन लिया। भगवान बड़ा दयालु है, वह सब-कुछ क्षमा कर देता है, बशर्ते कि करने वाला पश्चात्ताप करे।

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जब रामप्रसाद बिस्मिल फाँसी वालों से ये बातें कहते थे, तो कोई उन का प्रतिवाद नहीं करता था, जैसे कि हवालात के कई साथी किया करते थे। उस समय तो वह प्रतिवाद बहुत बुरा लगता था, पर आज यह याद कर के कि कोई प्रतिवाद नही कर रहा है, हृदय में एक टीस ही उठती थी। क्योंकि जीवन-मृत्यु के उन साथियों से फिर मिलना नहीं होना था। सब लोग अलग-अलग जेलों में बाँट दिए गए थे और पूर्व-निश्चय के अनुसार इस समय फाँसी की सजा पाए हुए क्रांतिकारियों के अतिरिक्त सब लोग अनशन कर रहे थे। कोई परवाह नहीं, जान चली जाए तो जाए, पर प्रदीप जल रहा है, अभी वह टिमटिमा रहा है, पर जल्दी ही वह एक विशाल अग्निकांड का रूप धारण करेगा, जिस में ब्रिटिश साम्राज्य खाक हो जाएगा।

तीनों साधारण फाँसी वालों में से एक-एक करके सब फाँसी पर चढ़ते चले गए, पर क्रांतिकारी दल के इस लौह-पुरुष ने फाँसी पर चढ़ने के लिए जाने वालों को ऐसा दृढ़ बना दिया कि वे खुशी से फाँसी पर चढ़ते चले गए। कपड़ा ही तो बदलना है, इसमें क्या धरा है! नया शरीर मिलेगा, तब पहले की गलतियाँ नहीं होंगी।

हर फाँसी वाला, जिस दिन फाँसी पर चढ़ना होता, उस दिन सवेरे फाँसी पर चढ़ने के पहले उनकी कोठरी के सामने ठिठक कर खड़ा हो जाता। यद्यपि यह बिल्कुल गैर-कानून बात थी, फिर भी जेल अधिकारियों ने इसे स्वीकार कर लिया था। बिस्मिल उसे सांत्वना के वाक्य कहते। वह पैर छूकर चल देता।

बिस्मिल पीछे से कहते, ‘घबराओ मत, मैं भी जल्दी ही आ रहा हूँ।’ फाँसी वाला तो चला जाता, पर बिस्मिल चिल्ला-चिल्ला कर बहुत जोर से गीता के श्लोकों की आवृत्ति करते और मन होता तो ‘सरफरोशी की तमन्ना’ गाते। फाँसी लगने का स्थान बगल में ही था, केवल एक ही दीवार बीच में पड़ती थी। जिस समय वह व्यक्ति फाँसी पर चढ़ जाता था, उसके कान में बिस्मिल की आवाज़ होती थी।

पुराने फाँसी वाले जाते गए, उनके स्थान पर नए फाँसी वाले आते गए। बिस्मिल ने उन्हें उसी प्रकार से समझाना जारी रखा। उसमें कभी कोई शिथिलता, कोई कमी नहीं आई। 19 दिसंबर 1927 का वह दिन भी आया, जब स्वयं रामप्रमाद बिस्मिल को फाँसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया गया। वह धीर गंभीर कदमों से फाँसी के तख़्ते की ओर गए और अंत में वह ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ कहते हुए फाँसी पर चढ़ गए।

सब फाँसी वाले रोए, यहाँ तक कि जमादारों ने भी चुपके-चुपके आँसू बहाए, पर किसी के मन में निराशा नहीं थी। वह मरकर भी अमरत्व का संदेश छोड़ गए थे और यह सबसे बड़ी बात है कि ऐन फाँसी का फंदा गले में डालते समय उन्होंने सब कुछ छोड़कर केवल ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ कहा! -मन्मथनाथ गुप्त

15 अगस्त का शुभ दिन

धन्य सुभग स्वर्णिम दिन तुमको,
धन्य तुम्हारी शुभ घड़ियां,
जिनमें पराधीन भारत मां,
की खुल पार्इं हथकड़ियां।
भौतिक बल के दृढ़-विश्वासी,
झुके आत्मबल के आगे,
सत्य-अहिंसा के सम्बल से,
भाग्य हमारे फिर जागे।
जय-जय की ध्वनि से गुंजित,
नभ-मंडल भी था डोल उठा,
नव जीवन पाकर भूतल का,
कण-कण भी था बोल उठा।
श्रद्धा से शत-शत प्रणाम,
उन देश प्रेम-दीवानों को,
अमर शहीद हुए जो कर,
न्यौछावर अपने प्राणों को।
कितने ही नवयुवक स्वत्व,
समरांगण में खुलकर खेले,
अत्याचारी उस डायर के,
वार छातियों पर झेले।
कितनों ने कारागृह में ही,
जीवन का अवसान किया,
अपने पावनतम सुध्येय पर,
सुख से सब कुछ वार दिया।
कितनों ने हंसकर फांसी को,
चूमा, मुख से आह न की,
सन्मुख अपने निश्चित पथ के,
प्राणों की परवाह न की।
अगणित माँओं के लाल हुए,
बलिदान देश बलिवेदी पर,
तब भारत माँ ने पाया,
ये दिवस आज का अति सुखकर।
पन्द्रह अगस्त का यह शुभ दिन,
कभी न भूला जाएगा,
स्वर्णाक्षर में अंकित होगा,
उच्च अमर पद पाएगा।
-महावीर प्रसाद ‘मधुप’

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