Ranbankure

Ranbankure: सरहदों पर दुश्मन के साथ लोहा लेने के बाद पर्यावरण संभाल में जुटे रणबांकुरे

देश की सुरक्षा में जो हाथ फौलाद बनकर दुश्मनों को नाको चने चबाते हैं, वही हाथ अब पर्यावरण की सुरक्षा का जिम्मा भी संभाले हुए हैं और नन्हें पौधों को अपने प्यार से इस कदर सींच रहे हैं कि देखते ही देखते बंजर हुई भूमि फिर से लहलहाने लगी है। कारगिल युद्ध की बात हो, या फिर आप्रेशन सिंदूर जैसे भारतीय पराक्रम की हो तो देश के इन जांबाज सैनिकों ने हर मैदान फतेह किया है।

हम बात कर रहे हैं एक ऐसी रेजीमेंट की जिसके वीर सैनिकों ने अपनी रिटायरमेंट होने के बाद भी देश सेवा का मिशन चला रखा है। इसके लिए उन्होंने अपनी एक बटालियन भी बना रखी है जिसका नाम है ई.टी.एफ, ईको टास्क फोर्स इकोलॉजिकल यूनिट। आर्मी की सिख लाइट इन्फेंट्री रेजिमेंट, सिख रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, जैक राइफल, पैरा कमांडो, इंजीनियर रेजिमेंट, तोपखाना रेजिमेंट, टैंक रेजीमेंट तथा अलग-अलग रेजीमेंट की फाइटिंग टी. ए. में अपने-अपने जौहर दिखाए। अब ये रिटायर्ड ट्रेंड सोल्जर भूतपूर्व सैनिक ईटीएफ यूनिट का हिस्सा बनकर पर्यावरण संरक्षण के प्रहरी के तौर पर करीब 26 वर्ष से लगातार अरावली पर्वतमाला के मैदानी व पहाड़ी क्षेत्रों को बचाने में जुटे हुए हैं।

जोकि अवैध खनन या भू-माफिया के चलते कभी बंजर होने की कंगार पर जा पहुंचे थे। पर्यावरण को नया रूप देने में जुटी ईटीएफ अब तक 45 लाख पौधे रोपित कर चुकी है। यही नहीं, पौधारोपण के अलावा इस मुहिम में जंगली जीवों की सार-संभाल करते हुए उनके लिए लघु तालाब (वाटर बोडिज) के रूप में पेयजल की व्यवस्था की जा रही है। प्रकृति के लिए इस अतुलनीय सहयोग के लिए ईटीएफ के जवानों को दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया है।

132 इन्फेंट्री बटालियन टेरिटोरियल आर्मी इकोलॉजिकल राजपूत बटालियन के सेवामुक्त जवानों ने वर्ष 2000 में इकोलॉजिकल टास्क फोर्स के रूप में पर्यावरण संरक्षण मुहिम को शुरू किया था। इनमें टैंक रेजीमेंट, तोपखाना रेजिमेंट, पैरा कमांडो, इन्फेंट्री बटालियन इत्यादि के जवान शामिल हैं। इस कार्य में दक्षिण दिल्ली और उसके निकटवर्ती हरियाणा सीमा पर अरावली पर्वतमाला की तलहटी का एरिया अरावली के इको-सेंसटिव ज़ोन और प्रसिद्ध वन्यजीव गलियारा माना जाता है। करीब 10 ऐसे एरिया हैं जहां अवैध खनन और खद्दानों के चलते हरियाली खत्म होती जा रही थी, वहां पौधे लगाने का कार्य युद्ध स्तर पर किया जा रहा है।

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Mohan Singhकमांडिंग 132 ईको टास्क फोर्स के कर्नल मोहन सिंह के नेतृत्व में जवान बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए वातावरण बचाओ मुहिम में जुटे हुए हैं। कर्नल मोहन सिंह सैनिक सम्मेलन के दौरान उन जवानों को सम्मानित भी करते हैं जो ग्राउंड लेवल पर बटालियन के टास्क में आगे बढ़कर अच्छे कार्य करके योगदान दे रहे हैं।

यूनिट के 270 सदस्य करते हैं पौधों की संभाल

लै. कर्नल दविंद्र सिंह के अनुसार, वातावरण संभाल रेजीमेंट बटालियन इकोलॉजिकल यूनिट में वर्तमान समय में 270 सदस्य हैं जिसमें सेना से जुड़े 4 सीनियर अधिकारी भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पेड़-पौधे लगाने के साथ-साथ वन्यजीवों को बचाने के लिए भी प्रयास किया जा रहा है। खासकर दक्षिण दिल्ली और हरियाणा सीमा से सटी अरावली पर्वतमाला की तलहटी में स्थित देवली, जोनापुर, डेरा मंडी , डेरा मंडी – 01, डेरा मंडी -02, खोली मंदिर, असोला, ओल्ड भाटी, न्यू भाटी, घिटोरनी, संगम विहार, तुगलकाबाद जैसे 10 और ऐसे प्वाइंट हैं,Devender Singh

जो खनन व पेड़ों की अवैध कटाई के चलते अति दुर्गम स्थल हैं। ऐसे एरिया में खद्दानों के चलते हरियाली गायब होती जा रही है। ऐसे में हमारी टीम पौधारोपण कार्य में बड़ी शिद्दत से जुटी हुई है। पौधारोपण करने के बाद उनकी संभाल और समय पर सिंचाई की पूरी व्यवस्था की जाती है ताकि पौधे पूरी तरह से कामयाब भी हों। इसके अलावा ऐसे जटिल एरिया में वन्य जीवों के लिए पानी की व्यवस्था भी की जा रही है। छोटे-छोटे कुंड बनाकर उनमें बकायदा टैंकरों से पानी भरा जाता है ताकि जीव-जंतु अपनी प्यास बुझा सकें। इस एरिया में नील गाय, तेंदुआ, जंगली सुअर काफी मात्रा में देखने को मिलते हैं।

चुनौतियां भी कम नहीं…

लै. कर्नल दविंद्र सिंह ने बताया कि इन एरिया में पौधे लगाने मात्र से कार्य खत्म नहीं हो जाता अपितु उनको बंदरों, खुले में घूमती गायों या अन्य जानवरों से बचाने के लिए विशेष ध्यान दिया जाता है। यहां पानी की बड़ी कमी रहती है जिसके चलते पौधे खराब होने का खतरा अधिक बना रहता है।

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नियमित सिंचाई आवश्यक है और सबसे बड़ी समस्या इस एरिया में दीमक से है। पत्थरीली भूमि होने के चलते यहां पौधे जल्दी से जड़ें नहीं बना पाते, ऐसे में दीमक उनकी छोटी-छोटी जड़ों को चट कर जाती है। पौधों को दीमक से बचाने के लिए बकायदा दवाई इत्यादि की व्यवस्था भी टीम द्वारा समयानुसार की जाती है। उन्होंने कहा कि पौधा लगाने के बाद कम से कम दो सीजन उसकी संभाल आवश्यक है तभी वह पेड़ बनने की दिशा में आगे बढ़ पाता है।

ट्री प्लांटेशन के वर्क को ग्राउंड पर जाकर चेक करते हैं मेजर जय सिंह

मेजर जय सिंह शेखावत सभी प्रोजेक्ट जो लगभग 10 पॉइंट हैं वहाँ ट्री प्लांटेशन के वर्क को ग्राउंड पर जाकर चेक करते हैं। खासकर जहाँ-जहाँ पौधे लगाए जाते हैं। बता दें कि मेजर जय सिंह के बड़े भाई देश की सेवा करते हुए शहीद हो गए थे। पिछले एक वर्ष से इस मुहिम का हिस्सा बने तरसेम सिंह ने बताया कि वैसे तो वर्षभर ही पौधारोपण का कार्य चलता रहता है, लेकिन बरसाती सीजन में विशेष तौर पर पौधारोपण अभियान चलाया जाता है।Jai Singh

वहीं पर्यावरण दिवस के जुड़े विशेष दिनों में भी बड़ी संख्या में पौधारोपण होता है। जवानों की इस मुहिम से पर्यावरण के साथ-साथ जंगली एरिया में अवैध तस्करी व नशे जैसे कारोबार पर भी रोक लगी है। पहले सुनसान एरिया के चलते लोग वन्य जीवों का शिकार करने से भी गुरेज नहीं करते थे, लेकिन अब ईटीएफ के जवान पौधे लगाने के साथ-साथ उनकी संभाल भी करते हैं, ऐसे में पूरे क्षेत्र में जवानों की गस्त चलती रहती है जिससे अवैध गतिविधियों पर भी स्वत: ही अंकुश लग गया है।

पर्यावरण संभाल में अग्रणी डेरा सच्चा सौदा

पेड़-पौधों की सेवा-संभाल में जुटे ये वीर जवान अपने आप में एक मिसाल हैं और प्रेरणा के पात्र हैं। डेरा सच्चा सौदा ऐसे वीर जवानों की दिल से प्रशंसा करता है जो पेड़-पौधों तथा वातावरण के लिए नि:स्वार्थ भाव से प्रयासरत है। डेरा सच्चा सौदा भी पेड़-पौधों के लिए विश्वभर में अग्रणी है और 35 करोड़ 7 लाख 88 हजार 523 पौधे लगाए जा चुके हैं।SKI 8654

डेरा सच्चा सौदा का यही आह्वान है कि हर कोई पेड़-पौधे लगाए व वातावरण की संभाल करने में अपना पूरा योगदान दे। यह बड़ा सुखद पहलू है कि ऐसे प्रयासों की बदौलत धरा की हरियाली फिर से अपने उसी रंग में आ जाएगी जो आज खत्म हो रही है।

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