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Editorial: महीनेभर की खुशियाँ लेकर आती है ‘सच्ची शिक्षा’ -सम्पादकीय

सच्ची शिक्षा के लिए पूज्य गुरु जी के अनमोल वचन हैं कि ‘यह महीनेभर की खुशियाँ लेकर आती है घर में। हर प्रेमी को इसे अपने घर लगवाना चाहिए। इसमें प्रकाशित रूहानी वचनों को पढ़ने-सुनने का कुछ ना कुछ फल लाजिमी मिलता है।’ फलस्वरूप सच्ची शिक्षा में दिए गए रूहानी सत्संग के प्रकाश का मन पर असर न हो, ऐसा हो नहीं सकता। यह हमारी भावना पर निर्भर होता है। हमारा जैसा भाव, जैसा विश्वास, वैसा ही हम पाते हैं।

प्रिय पाठकगण! बड़े हर्ष की बात है कि मासिक पत्रिका ‘सच्ची शिक्षा’ का सुहाना सफर अपने 29वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आपके प्यार व सम्मान से भरपूर बीते 28 वर्षों में सच्ची शिक्षा ने घर-घर रूहानी महक देकर एक अमिट छाप छोड़ी है। अपने पाठकों के साथ एक अभूतपूर्व रिश्ता कायम किया है। यह जुड़ाव किसी बाहरी दिखावे से नहीं बल्कि अन्तर्मन से है। किसी से आंतरिक तौर पर जुड़ाव होना आत्म संतुष्टि का सबब होता है।

जहाँ आत्म-संतुष्टि का भाव उत्पन्न हो उससे बढ़कर कुछ हो नहीं सकता। फिर सच्ची शिक्षा तो आत्म-संतुष्टि का निरोल केंद्र है। इसका आध्यात्मिक अध्ययन, अध्यात्मिक मार्गदर्शन इसकी विलक्षणता है। रूहानियत, इन्सानियत की शिक्षा ही इसकी पहचान है। रूहानी प्यार इसकी अनमोल पंूजी है। यही इसकी दौलत है। यही इसका खजाना है। इसका यही जलवा पाठकों के दिलों में बसता है। अपने सुधी पाठकों के साथ इतने लंबे वर्षों का सुहाना सफर एक बेजोड़ दास्तां है।

ज्ञातव्य है कि सितंबर 1998 को पहला अंक प्रकाशित हुआ था। पूज्य गुरु जी के पाक-पवित्र सान्निध्य में इसका प्रकाशन होना प्रिय पाठकों के लिए संजीवनी से कम नहीं है। किसी पत्रिका से समाज को रूहानियत का ज्ञान मिले और इन्सानियत का संदेश मिले, समाज के लिए इससे बड़ी नियामत और क्या हो सकती है। ऐसी पत्रिका का प्रकाशन पूज्य गुरु जी की मेहरबानी है और पाठकों की खुशकिस्मती। कितने खुशकिस्मत हैं वो पाठक जो इसके जरीये घर बैठे ही रूहानी संदेश व रूहानी प्यार से लबालब हो रहे हैं। उनको जीने के ढंग सीखा रही है

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सच्ची शिक्षा। उच्च संस्कारों से धनी बना रही है उनको। गुणवान और संस्कारवान होना सुदृढ़ समाज के लिए निहायत जरूरी है। वर्तमान का जो दौर है, ऐसे में सच्ची शिक्षा का प्रकाशन सोने पे सुहागा है। जिस प्रकार आज के समय में तमाम लचर सामग्रियां प्रचलन में हैं, ऐसे में समाज को साफ-सुथरा पठन-पाठन उपलब्ध कराने में सिरमौर है सच्ची शिक्षा। इसका यही विशेष गुण पाठकों के लिए फख्र की बात है।

समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने में अव्वल है ‘पत्रिका सच्ची शिक्षा’। इसके प्रकाशन का जो मकसद था, वह सफल सिद्ध हो रहा है। घर-घर में इसका जलवा सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके प्रति पाठकों की दीवानगी बेमिसाल है। सच्ची शिक्षा के प्रति बेपनाह प्यार की तस्वीर उनके घरों में देखी जा सकती है। सच्ची शिक्षा को पाकर उनके चेहरे खिल जाते हैं। उनके लिए यह कभी पुरानी होने वाली नहीं है। अंक-दर-अंक सहेज कर रखे जाते हैं।

शुरु से लेकर आज तक के अंकों का भंडार सजा हुआ है घरों में। जब जी चाहे कोई भी अंक निकाला और पढ़ कर तन-मन को खुशी से भर लेते हैं वो। हर अंक अनमोल है उनके लिए। इससे उनको जो आनन्द मिलता है वो ला-ब्यां है। रूहानी ऊर्जा का एक अनोखा स्त्रोत है यह उनके लिए। इसी ऊर्जा की बदौलत उनका इतना दृढ़ विश्वास है कि इससे उनको जो मिलता है वो किसी और पत्रिका, रसाले या अन्य साधनों से नहीं मिल सकता। उनके लिए जिंदगी का बेशकीमती उपहार है ये।

रूहानी प्रकाश की यह लौ सच्ची शिक्षा के जरिये हर घर में जगमग है। हर घर इससे संवर रहा है, चमक रहा है। पूज्य गुरु जी के पावन चरणों में यही अरदास है कि सच्ची शिक्षा पावन सान्निध्य में यूं ही समाज को सही व नई दिशा देने में अग्रसर रहे। सदैव प्यारे पाठकों के दिलों पर राज करती रहे।

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