Experiences of Satsangis बेटा, यह गोली पानी के साथ ले ले, ठीक हो जाएगी…’ -सत्संगियों के अनुभव: पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर
प्रेमी मुख्तयार सिंह इन्सां पुत्र श्री जग्गर सिंह गांव दयौण, जिला भटिंडा (पंजाब) से अपने सतगुरु पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपनी बेटी पर हुई रहमत का वर्णन इस प्रकार करते हैं:-
सन् 1989 की बात है। मेरी बेटी सुखप्रीत कौर अपने ननिहाल में रहती थी। उस समय वह 7 वर्ष की थी और दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। अचानक उसके बाएं पैर में चोट लग गई, जिससे उसका पूरा पैर जमीन पर नहीं लगता था। जब वह स्कूल से पढ़कर घर आई तो वह पैर के पंजे पर भार देकर बड़ी मुश्किल से चल पा रही थी। मेरे ससुराल परिवार ने पहले उसे गाँव में जो थोड़ा-बहुत टूटी हड्डियाँ बांधते हैं, उनको उसका पैर दिखाया परंतु उनकी समझ में कुछ नहीं आया। फिर रामां में तथा उसके बाद नथाना में डॉक्टरों को लड़की का पैर दिखाया।
डॉक्टरों ने चैकअप किया तो बताया कि कोई हड्डी टूटी नहीं, उतरी नहीं बल्कि चोट की वजह से सोजिश है जिससे इसे तकलीफ है। लड़की उन डॉक्टरों के अनुसार दवाई खाती रही परंतु कोई आराम नहीं आया। जब पंद्रह-बीस दिनों तक आराम नहीं आया तो मेरे ससुर लड़की को साथ लेकर हमारे घर दयौण आ गए। मैं अपनी सरकारी नौकरी ड्यूटी पर थर्मल प्लांट भटिंडा गया हुआ था। मुझे अचानक पता चला कि पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज डेरा सच्चा सौदा सांझा धाम मलोट में आए हुए हैं। मैं दफ्तर से सीधा मलोट चला गया। जब मैं शाम की रूहानी मजलिस सुनकर घर वापिस आया तो मेरे ससुर जी मुझे कहने लगे कि बेटा, इतना अंधेरा कर लिया।
मैंने बताया कि मलोट दरबार में सतगुरु जी आए हुए हैं। मैं दफ्तर से सीधा मलोट चला गया था। मेरे ससुर ने लड़की के बारे में सारी बात मुझे बताई कि कैसे उसका इलाज करवा रहे हैं। मैं सुबह चार बजे उठकर मलोट दरबार चला गया। सुबह की मजलिस सुनकर भटिंडा दफ्तर में पहुँच गया। शाम को परमपिता जी मलोट में ही थे। मैं दफ्तर से फिर मलोट दरबार चला गया। जब शाम को वापिस घर आया तो मेरे ससुर जी मुझे कहने लगे कि बेटा, मैं लड़की को लेकर आया हूँ, तू मलोट ही फिरता रहेगा। इसे कहीं दिखा ताकि मुझे पता चले कि क्या कारण है, लड़की पैर नीचे क्यों नहीं लगाती? मैंने कहा कि सुबह भटिंडा में डॉक्टर को दिखाएंगे। आप उधर ही चले जाना।
मुझे सुबह फिर पता चला कि घट-घट की जानने वाले दयालु, परोपकारी परमपिता जी अभी मलोट में ही हैं। मैं सुबह फिर मलोट दरबार पहुँच गया। परमपिता जी के दर्शन करके अपने दफ्तर भटिंडा आ गया। मेरे ससुर मेरी पत्नी से लड़ाई करने लगे कि ये क्या करता फिरता है, मलोट जाना है! मलोट जाना है! मैं यहाँ बैठा हूँ, चार दिन हो गए। इसे बच्चों का कोई फिक्र नहीं! मेरी पत्नी कहने लगी कि ये नहीं रूकेंगे, इन्हें कुछ न कहो। मेरे ससुर जी गुस्से में अपने गाँव वापिस चले गए। वहीं मेरे दिल में था कि सतगुरु जानें, उसकी मौज!
मुझे पता चला कि शाम को परमपिता जी मलोट में ही थे, तो मैं फिर से मलोट चला गया। जब देर रात को मैंने घर के गेट पर आकर मोटरसाइकिल का हॉर्न बजाया तो वही लड़की सुखप्रीत भागी-भागी आई और उसने गेट खोल दिया। वह बिल्कुल ठीक लग रही थी, उसका पूरा पैर नीचे जमीन पर लग रहा था। मैंने उससे कहा कि मेरे कपड़े लेकर आ! वह भागकर मेरे कपड़े ले आई। उसका पूरा पैर नीचे लग रहा था। मेरी पत्नी मुझे कहने लगी कि बापू जी नाराज़ होकर चले गए हैं। मैंने बेटी सुखप्रीत से पूछा कि बेटा! पैर ठीक है?
सुखप्रीत ने कहा कि हां पापा जी! आज अपने घर एक बाबा जी आए, उनके हाथ में डंगोरी थी। उन्होंने मुझे एक गोली देते हुए कहा, ‘बेटा! यह गोली पानी के साथ ले लो, ठीक हो जाओगी।’ मेरे देखते ही देखते वो बाबा जी पता नहीं किधर चले गए। मैंने वो गोली पानी के साथ ले ली और मेरा पैर बिल्कुल ठीक हो गया। यह तो वो ही बात हुई कि ‘जेहड़ी सोचां ओही मन्न लैंदा, मैं किवें भुल जावां पीर नूं।’
सतगुरु जी ही एक बाबा का रूप धारण कर हमारे घर आए और बच्ची को गोली के बहाने ठीक कर गए। मेरा मानना है कि जो जीव सतगुरु के दिखाए मार्ग पर चलता है, विश्वास करता है, उसकी भावना शुद्ध है, तो सतगुरु जी उसके सभी काज संवारते हैं।

































































