Experiences of the Satsangis

Experiences of the Satsangis बेटा उठ! तेरे कमरे में आग लग गई है!’ -सत्संगियों के अनुभव

पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत

प्रेमी राम आसरा गर्ग इन्सां उर्फ बिट्टू निवासी भादसों (पंजाब), हाल आबाद शाह सतनाम जी नगर सरसा से पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने पर हुई रहमत का वर्णन इस प्रकार करते हैं-

वर्ष 1992 की बात है। मैं अपनी छोटी बहन सरोज की कुशलता जानने के लिए उसके ससुराल लहरागागा (पंजाब) में गया हुआ था। उस वक्त मेरी बहन बीमार थी। रात के समय मैं, मेरी बहन, जीजा जगदीश और परिवार के कुछ लोग एक कमरे में बैठे सतगुरु जी की तथा राम-नाम की चर्चा कर रहे थे। सतगुरु के प्रेम व भक्ति की बातों में ऐसा रंग जमा कि समय का पता ही नहीं चला और रात गहरी होने लगी। तभी अचानक लाइट चली गई।

मेरी बहन ने रोशनी के लिए एक मोमबत्ती जला दी और उसे लकड़ी की मेज पर रख दिया। हम सभी उसी मेज के पास बैड पर बैठे थे। बातें करते-करते कब नींद आ गई, कुछ पता ही नहीं चला। अचानक गहरी नींद में मुझे एक सपना आया। उस सपने में एकदम रोशनी हुई और पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां प्रकट हुए। सतगुरु जी अपनी मधुर वाणी में बोले, ‘बेटा उठ! तेरे कमरे में आग लग गई है।’ उनकी आवाज़ इतनी साफ तथा गहरी थी कि मैं पल में उठ खड़ा हुआ। कमरे में आग की लपटें उठ रही थी।

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मैं जोर से चिल्लाया, ‘आग लग गई।’ मेरी आवाज़ सुनकर जीजा जी तथा बहन भी जाग गई। हम सभी ने फुर्ती से कमरे से बाहर निकलकर आग पर काबू पाया। सतगुरु जी की कृपा से न सिर्फ आग बुझ गई, हमारी जान भी बच गई। मेरी आँखों में आँसू थे तथा दिल में शुक्राने की भावना थी। मैं बार-बार यही कह रहा था कि यह सतगुरु जी का करिश्मा है। अगर वे सपने में न आए होते तो शायद हम आग की चपेट में आ जाते। सतगुरु जी ने हमें नई जिंदगी बख्शी है।

मैं तहेदिल से लाख-लाख शुक्राना करता हूँ। वो दर्शन देने वाले पल मैं कभी भूल नहीं सकता। एक तरफ जान बचाई, दूसरी तरफ अत्यंत खुशी बख्शी। मैं अपने सतगुरु के मुझ पर हुए परोपकारों को लिख-बोलकर ब्यां नहीं कर सकता, बस, धन्य! धन्य! ही कह सकता हूँ।