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रूहानी संतों की पाक-पवित्र शिक्षा‘धरती भी बन सकती है स्वर्ग-जन्नत…’ -सम्पादकीय Editorial

संत-महापुरुषों और सभी धर्मों के अनुसार मनुष्य जन्म कर्म की धरती है। इसमें जैसा कोई बीज बोता है, वैसी ही फसल वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है। अगर जो कोई कीकर के बीज लगाता है तो बिजौर देश की दाखें उसे कैसे प्राप्त होंगी, कांटे ही मिलेंगे, ऐसा धर्मों में बताया गया है। रूहानी संतों, महापुरुषों का फरमान है कि ‘बिन किया लागै नहीं, किया ना बिरथा जाइ।’ महापुरुषों का कथन है कि इन्सान जो भी कर्म करता है, चाहे वो अच्छा करे या बुरा करे, उसका फल इन्सान को जरूर मिलता है।

कर्म के फल से बचा नहीं जा सकता। प्रकृति का भी यही नियम है कि उसे भुगतना ही पड़ता है। लेकिन आज के इस मतलब परस्त घोर कलियुग में लोग भोगों के कीड़े बन चुके हैं। खाओ, पीओ, मौज करो का ही असूल बना रखा है। ‘इह जग मिट्ठा, अगला किस डिट्ठा।’ तो महापुरुषों के अनुसार इन्सान की बन चुकी ये मनोदशा वाकई बहुत चिंताजनक है। जबकि वेद, शास्त्रों सहित सभी धर्मों में आता है कि इन्सान का पहला फर्ज- अल्लाह, वाहेगुरु, राम, गॉड की भक्ति-इबादत करना, परमपिता परमात्मा को याद करना तथा अपने माता-पिता, बड़े बुजुर्गों का सत्कार व छोटे बच्चों से प्यार करना और अपने-अपने धर्म के प्रति वफादार रहते हुए हक-हलाल, मेहनत की करके खुद भी खाएं और उसका कुछ हिस्सा बचाकर अपने हाथों से जरूरतमंदों, दीन-दुखियों की मदद में लगाएं। सभी धर्मों में ये ही बताया गया है।

पूर्ण संत, गुरु, पीर-फकीर मनुष्य शरीर में हमारी तरह इसी समाज का अंग होते हैं। इतिहास के ज्ञाता सभी लोग जानते हैं कि समाज में समय-समय पर उठ रही सती प्रथा, दहेज प्रथा इत्यादि सामाजिक बुराइयों का विरोध देश में अनेक समाज सुधारकों ने भी किया, सामाजिक बुराइयों के खिलाफ उन्होंने तत्कालीन हालातों के चलते भी जोरदार आवाज उठाई थी और उन्हें भी रूढ़िवादी लोगों के आक्रोश के कारण काफी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा था। लेकिन समय पाकर वो बुराइयां आज जनता को भी बुराइयां ही लगने लगी है।

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लेकिन संत-महापुरुष तो सृष्टि पर आते ही मानवता के उद्धार के लिए हैं, वे पूरी सृष्टि का ही भला करने के लिए आते हैं। समाज में प्रचलित नशे आदि बुराइयों की वजह से मानव दु:खी, परेशान हो, चहुं ओर त्राहि-त्राहि हो रही हो, धर्मों का ह्नास हो रहा हो, तो जीवात्मा का यह दर्द तो मालिक के प्यारे संत-महापुरुष ही महसूस कर सकते हैं क्योंकि परमपिता परमात्मा ने जीवात्मा को पाप-गुनाहों आदि बुराइयों से उबारने की उनकी ड्यूटी लगाई होती है। रूहानी महापुरुषों का इससे कोई सरोकार नहीं कि चाहे कैसा भी कोई कर्म करता है

क्योंकि प्रकृति के नियमानुसार ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ लेकिन संतों का मकसद, एकमात्र उद्देश्य मानवता को सुख पहुंचाना जीवात्मा का उद्धार करना ही होता है। चाहे उन्हें कोई कुछ भी कहता फिरे, लेकिन वो अपने उद्देश्य के अनुसार सबका भला ही करते हैं। इन्सान को इन्सान से जोड़ना, इन्सान को धर्मों से और इन्सान को परमपिता परमात्मा से जोड़ना, संत सृष्टि पर आकर ऐसे परोपकारी कर्म करते हैं। डेरा सच्चा सौदा में शुरु से ही मानवता का पाठ पढ़ाया जाता है।

डेरा सच्चा सौदा के मौजूदा पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां का लोगों में मर चुकी इन्सानियत की भावनाओं को जगाने, उन्हें पुनर्जीवित करने, लोगों को अपने पारिवारिक व सामाजिक फर्जों के प्रति सुचेत करने, सबको अपने धर्म के प्रति वफादार बने रहने, समाज को गंदे-गंदे नशों, कन्या भ्रूण हत्या आदि बुराइयों से मुक्त करने का लोकहित में यह आह्वान हर वर्ग के लिए अति सराहनीय है।

पूज्य गुरु जी ने सरेआम सत्संग में भी यही संदेश दिया है कि अगर इस मिनट में सृष्टि का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म को सच्चे दिल से मानने का आह्वान कर ले, मान ले (दिखावा न हो) तो अगले मिनट में ही यह धरती स्वर्ग-जन्नत से बढ़कर यहाँ नज़ारे देखे जा सकते हैं। यानि जब बच्चा-बच्चा ही धर्म के मार्ग पर चलने लगेगा, बुराइयों का त्याग कर परमपिता परमात्मा की सच्ची भक्ति, राम-नाम से जुड़ जाएगा तो समाज में अमानवीय कार्यों का तो कोई मतलब ही नहीं, कोई सवाल ही नहीं उठता।

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पूज्य गुरु जी ने अपने रूहानी सत्संगों के माध्यम से करोड़ों लोगों (साढ़े 7 करोड़ से ज्यादा) को बुराइयों से मुक्त कर रामनाम से, धर्मों से जोड़ा है और पूज्य गुरु जी का मानवता व समाज हित में यह पुनीत करम निरंतर जारी है। यहाँ धरती पर स्वर्ग-जन्नत से बढ़कर नज़ारे हो, सृष्टि ्रका प्रत्येक प्राणी सुखपूर्वक, बेधड़क जीवन जीए, यही पूज्य गुरु जी चाहते हैं और यही सभी रूहानी महापुरुषों का उद्देश्य रहा है।