Editorial: डोर अपनी गुरु के हाथ में दे… सम्पादकीय
रूहानियत-सूफियत सच्चे रूहानी संत-महापुरुषों, रूहानी पीर-फकीरों से ही शुरु होती है और इन्हीं महापुरुषों के साथ ही जुड़ी रहती है। उन्हीं के ही पवित्र ग्रंथों में यह पाया जाता है कि रूहानियत अनगिनत खुदाई-रहस्यों से सटी (भरी) पड़ी है। ऐसे अजीबोगरीब अनगिनत ईश्वरीय करिश्मे कि जिन्हें दृढ़-विश्वासी अभ्यासी प्रेमीजन अपने नित्य के सुमिरन-अभ्यास के द्वारा अपने अंदर आत्मा की निगाहों से देखते एवं अनुभव करते हैं।
अपने उन अनुभवों को वह दृढ़ विश्वासी जीव अपने गुरु मुर्शिदे-कामिल की पाक-पवित्र हजूरी में साध-संगत से जब कभी सांझा करते हैं तो हर कोई आश्चर्य चकित हो अपने सतगुरु मौला का कोटि-कोटि धन्यवाद करते नहीं थकते। इसके विपरीत मनमुख व मनमते जो चलता है, वो अपने-आप में उलझा हुआ रहता है। वह अपनी बुद्धि के बल पर तर्क-वितर्क बहुत करता है। ज्यादातर लोगों का ऐसा ही हाल हो रहा है। वो अपने बल-बुद्धि के द्वारा ही सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। उनको यही लगता है कि वो अपनी चतुराई से ही बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं।
लेकिन अध्यात्म की राह पर चलने वाले समझते हैं कि मनुष्य की बुद्धि जहां पर जवाब दे जाती है वहीं से सतगुरु की रहमत शुरु होती है। एक शिष्य अपने सतगुरु का सहारा लेकर ही चलता है। सतगुरु के प्रति दृढ़-विश्वास उसके हर मार्ग को सुखाला बना देता है। जब कभी कोई इन्सान उस रूहानी शक्ति से जुड़ता है तो उसे किसी गम-दु:ख की चिंता सता नहीं सकती। वह सब कुछ अपने सतगुरु पर छोड़ देता है।
इस बारे में डेरा सच्चा सौदा के पूज्य मौजूदा गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने इस सच्चाई को अति आसान शब्दों में स्पष्ट करते हुए फरमाया कि वह परमपिता परमेश्वर, अल्लाह, राम, वाहेगुरु, गॉड, उसे चाहे किसी भी नाम से भी पुकारें, असंख्य नाम हैं उसके लेकिन वो एक है। वो मालिक अपनी दृढ़-विश्वासी प्यारी रूह, यानि उस जीवात्मा को उसकी सच्ची तड़प के अनुसार उसके गुरु, पीर-फकीर के रूप में अवश्य अपने दर्श-दीदार व अपनी अपार खुशियों से मालामाल करता ही रहता है।
तो स्पष्ट है कि जीव का अगर अपने सतगुरु-मालिक के प्रति चट्टान से भी मजबूत और स्थिर दृढ़-विश्वास है तो उसे अंदर-बाहर किसी भी तरह की खुशियों में कभी कमी नहीं रहती क्योंकि उसका सतगुरु-मालिक उसके हर कार्य खुद आगे बढ़कर पूरा करता रहता है। इसीलिए ही यह कहा जाता है कि रूहानियत में दृढ़ विश्वास ही सर्वोपरि है और दृढ़-विश्वास अति जरूरी है। जब प्रेमी अपनी डोर सतगुरु के हाथ में देकर चलता है तो हर मंजिल आसानी से तय हो जाती है। रूहानियत में यही सफलता की एक सीढ़ी है।

































































