success: सफलता के लिए जरूरी है धैर्य

कौन व्यक्ति होगा जो जीवन में सफल नहीं होना चाहता पर बहुत कम लोग आज ऐसे हैं जो सफलता के लिए इंतज़ार करते हैं। उसे पाने की हर किसी को बेकरारी है। हर कोई उतावला हो उठता है। आज सफलता के मायने ही बदले हुए नज़र आते हैं। मापदण्ड दौलत के तराजू पर होता है। जो जितना धनी, वह उतना ही अपने क्षेत्र में सफल समझा जाता है। यही वजह है कि हर कोई सफलता का आनंद चखने के लिए पागल है।

अवसरवादिता के युग में सफलता प्राप्ति के तरीके बदल गए। बिना कुछ किए सफलता मिलती जा रही है। इसे तो हम भाग्य का चक्कर कहेंगे। यह सफलता थोपी हुई सफलता कहीं जाएगी। ऐसी सफलता का टिकना मुश्किल रहता है यह कब खिसक जाए, कहा नहीं जा सकता। सफलता की वास्तविकता तो तब कही जाएगी जब सफलता परिश्रम द्वारा हासिल की गई हो।

परीक्षा में हजारों विद्यार्थी बैठते हैं। जो सफल होता है, वह उत्तीर्ण। अनुत्तीर्ण को फेल यानी असफल समझा जाता है। अब यदि उत्तीर्ण हुए विद्यार्थी ने नकल की हो और पैसे के द्वारा सफलता हासिल की हो तो ऐसे विद्यार्थी का उत्तीर्ण होना सफलता कदापि नहीं। उसे सफल विद्यार्थी नहीं कह सकते, हाँ, नकल करने में अवश्य सफलता मिल गई। यहाँ सफलता का अर्थ हुआ उद्देश्य की पूर्ति। सच्चे अर्थ में सफलता उद्देश्य की पूर्ति ही है पर उद्देश्य की पूर्ति नैतिक ढंग से होनी चाहिए।

success storyसफलता जिस ताले में बन्द रहती है वह दो चाबियों से खुलता है, एक परिश्रम और दूसरा सद्प्रयास। कोई भी ताला यदि बिना चाबी के खोला गया तो आगे उपयोगी नहीं रहेगा। चोरी होने की सदैव संभावनाएं रहेंगी। ठीक ऐसे ही यदि सफलता थोपी हुई है अथवा मुफ्त में मिली है तो वह टिक नहीं सकती। कभी भी छिन सकती है। संयोगवश जो हुआ, वह सदैव होगा, कोई गारन्टी नहीं। निरन्तर प्रयास और परिश्रम से प्राप्त हुई सफलता का अपना अलग ही महत्व है। संतोष और सुख की प्राप्ति होती है।

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अनीति का साम्राज्य देर तक नहीं टिकता। धर्म-अधर्म की लड़ाई में अन्तिम जीत हमेशा धर्म की होती है। अत: यह अत्यंत जरूरी है कि सफलता प्राप्ति का मार्ग नैतिकता और धर्म की परिधि में भले ही टेढ़ा-मेढ़ा क्यों न हो, पर परिश्रम और प्रयास का प्रतिफल हो।

नैतिक पतन, चरित्र हनन और ईमान बेचकर कार्य सिद्धि सफलता नहीं मानी जा सकती पर आज सफलता हासिल करने के लिए हर कोई शार्टकट वाला मार्ग पसन्द कर रहे हैं। किसी भी कीमत पर हर कोई सफलता चाहता है। सफलता के लिए जल्दबाजी कोई नई बात नहीं लेकिन जल्दबाजी में हम नैतिकता भूल जाते हैं।

समझौता करना बुरा नहीं। बुराई है अवसरवादिता की आड़ में स्वार्थ सिद्धि के लिए किया गया समझौता, सिर्फ स्वयं के सुख के लिए सोचना और उसी अनुसार कार्य करना और सम्बन्ध बनाना। सिद्धान्तहीन जिन्दगी का कोई महत्त्व नहीं।
-राजेन्द्र कुमार मिश्र

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