Criticism

Criticism: आलोचना से बच कर रहें

आलोचना एक ऐसी चिंगारी है जो किसी भी व्यक्ति के अहंकार को पलभर में जलाकर राख कर सकती है और हो सकता है यह किसी की मृत्यु का कारण भी बन जाएं मगर लोग इस बारे में कम ही सोचते हैं। कुछ लोग तो ऐसे भी देखे गए हैं जिनको किसी दूसरे की आलोचना करने में अत्यधिक आनन्द की अनुभूति होती है। वे इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते कि उनकी आलोचना करने की यह आदत किसी दूसरे के लिए कितनी कष्टदायक है?

उनकी यही आदत उन्हें लोगों से बिल्कुल अलग-थलग कर सकती है जिसके कारण वह चिड़चिड़े व्यक्ति के नाम से सम्बोधित किये जाने लगते हैं। जहाँ पुरूषों के बीच आलोचना व समालोचना का वर्चस्व कायम रहता है, वहीं महिलाएं भी इस अव्यवहारिक कृत्य में पीछे नहीं हैं। अक्सर महिलाओं में भी इसी प्रकार के दोषपूर्ण गुण देखे जाते हैं। वे भी अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए किसी दूसरे की आलोचना करने से कतई परहेज नहीं करती।

हमारे पड़ोस की एक महिला हैं जिन्हें हर किसी की आलोचना करने की बीमारी है। यदि मोहल्ले की कोई अन्य महिला नई साड़ी खरीद कर लाती है और उन्हें दिखाती है तो पहले उन्हें वह साड़ी कदापि पसन्द नहीं आएगी और यदि पसंद आ भी गई तो उस महिला पर यह कह कर अपने कटाक्ष के बाण छोड़ना शुरू कर देती हैं कि यह साड़ी तुम आठ सौ रुपए में लाई हो, लगता है तुम अच्छी तरह से ठगी गई हो। कहीं यह आठ सौ रुपए की मिलती है।Criticisms

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क्या अरे यह तो फलां जगह मैंने तीन सौ रुपए की देखी थी पर मैंने नहीं खरीदी क्योंकि इसका फैशन अब बहुत ‘ओल्ड’ हो चुका है। शुरू शुरू में तो आस पड़ोस की सभी महिलाएं उनकी इस आदत को सलाह मशवरा के रूप में स्वीकार करती रहीं परन्तु ज्यों-ज्यों उनके इस दोषपूर्ण गुण से वाकिफ होती गर्इं, उनसे कन्नी कतराने लगी। अब स्थिति यह हो गई कि मोहल्ले की सभी औरतें अपनी हर नई खरीदी गई चीज़ को इस प्रकार से छुपाती हैं कि वह उनकी दृष्टि में न आने पाए और उनकी आलोचना का शिकार न होना पड़े।

दरअसल, प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह पुरूष हो या स्त्री, अपने आपको पूर्ण समझता है। हालांकि, दुनिया में अभी तक कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं हुआ है, परन्तु फिर भी वह अपने अन्दर छुपी हुई कमियों का बखेड़ा करवाना नहीं चाहता। यदि किसी दूसरे द्वारा उसकी कमियों को उजागर किया जाता है तो वह सहन नहीं कर पाता और द्वेषपूर्ण भावना से वह भी उसकी आलोचना करना प्रारंभ कर देता है। कभी-कभी यही स्थिति इतना भयावह रूप धारण कर लेती है जिसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

दरअसल, जब हम किसी के साथ व्यवहार कर रहे होते हैं तो यह भूल जाते हैं कि जिसके साथ हम व्यवहार कर रहे हैं उसका भी कोई मानसिक आवेग है, वह भी अपने आप को पूर्ण व्यक्ति मानता है तथा पक्षपात, गर्व, अहंकार उसके अन्दर भी मौजूद है। अब यदि उसके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाए और उसके क्रिया-कलापों की आलोचना की जाए तो उसके मानसिक आवेग की क्या स्थिति होगी, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

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ध्यान रहे, एक शराबी कभी भी शराब को बुरा नहीं कहता जबकि दुनिया को मालूम है कि शराब किसी घर को तबाह करने के लिए पर्याप्त है। एक अपराधी भी यही समझता है कि वह जो कुछ कर रहा है, वह सब सही है भले ही दुनिया उसे बुरा कहे। जब एक शराबी व एक अपराधी भी अपने आपको पूर्ण समझता है तथा अपने किए गए असामाजिक कृत्य को उचित ठहराता है तो वे लोग जो हमारे और आपके सम्पर्क में हैं, अपनी आलोचना कैसे सहन कर सकते हैं?

अत: किसी की आलोचना करने से बेहतर है कि हम उससे यह जानना चाहें कि वह जो कुछ कर रहा है या करता है, क्यों करता है? उसका कारण क्या है? यह आलोचना की अपेक्षा कहीं अधिक लाभदायक व कारगर सिद्ध होगा। इनसे सहिष्णुता, सहानुभूति व दयालुता प्रकट होती है।

किसी की आलोचना करने से बेहतर है कि उसे क्षमा किया जाए तथा उसे अच्छी तरह से जानने समझने का प्रयत्न किया जाए। यकिन मानिए ऐसा करके आप स्वयं सुखद रहेंगे व दूसरों के अज़ीज़ भी बनेंगे। -नज़म काजिम

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