Experiences of Satsangis: ऐसे भी करता है वो संभाल…-सत्संगियों के अनुभव -पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत
जीएसएम सेवादार भाई जयमान जी इन्सां सुपुत्र सचखंडवासी श्री मातूराम जी निवासी गांव शाह सतनाम जी पुरा जिला सरसा से अपने सतगुरु पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की एक उस अपार रहमत का वर्णन करते हैं जो उन्होंने खुद महसूस किया और खुद अपनी आँखों से प्रत्यक्ष रूप में देखा भी है।
करीब सन् 2010 की घटना है। उन दिनों बतौर जीएसएम सेवादार (मेरी सेवा) की ड्यूटी वर्ष 2008 से पूज्य गुरु जी द्वारा स्थापित एमएसजी डेरा सच्चा सौदा व मानवता भलाई केंद्र परममोक्ष मैसूर (कर्नाटका) में लगाई गई थी। वर्णनीय है कि उन्हीं दिनों में पूज्य महान परोपकारी गुरु जी अपनी जीवोद्धार यात्रा के पवित्र उद्देश्य से दक्षिण भारत के इसी एरिया में पधारे हुए थे और जीवोद्धार की अपनी निश्चित यात्रा को सम्पन्न कर उस दिन डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार वापिस आना था। आपजी वहाँ से बैंगलुरु हवाई अड्डे के लिए रवाना हो गए थे।
सतगुरु प्यारे के पावन दर्शनों की तड़प लेकर मैं भी मैसूर डेरे से बैंगलुरु गया हुआ था। बैंगलुरु की साध-संगत के जिम्मेवार भाई तथा अन्य कुछ प्रेमी सेवादार भी पहले से वहाँ पर थे। बैंगलुुरु हवाई अड्डे पर मैंने भी अन्य साध-संगत, सेवादार भाइयों के साथ ही पूज्य गुरु जी के दर्शन किए। पूज्य गुरु जी ने प्रसाद व अपने पावन आशीर्वाद के रूप में मुझे अपना ढेर सारा प्यार व पावन स्रेह बख्शा। इसके उपरांत फ्लाइट का समय होने पर पूज्य सतुगरु जी वहाँ से दिल्ली के लिए रवाना हो गए और दिल्ली एयरपोर्ट से ही पूज्य गुरु जी ने पहले से ही तैयार खड़ी डेरा सच्चा सौदा की गाड़ियों के द्वारा सरसा दरबार में जाना था।
पूज्य गुरु जी के बैंगलुरु से दिल्ली फ्लाईट में रवाना होने के बाद मैं वापस मैसूर दरबार को जाने के लिए सोच ही रहा था कि बैंगलुरु के बस स्टेंड तक कोई साधन आदि ही मिल जाए। इतने में मुझे बैंगलुरु यानि कर्नाटक राज्य के एक सच्चे नम्र सेवादार किशोर जी इन्सां मिल गए। उनके पास गाड़ी थी। मैंने उनसे की, लिफ्ट मांगी कि अगर आप मुझे अपनी गाड़ी से बैंगलुरु बस स्टेंड तक छोड़ दें तो मैं बस के द्वारा मैसूर को चला जाऊंगा।
तो किशोर जी कहने लगे कि मैं भी मैसूर ही जा रहा हूँ और आपको मैं मैसूर डेरे में ही छोड़ दूंगा। इस प्रकार मैं उनके साथ ही उनकी गाड़ी में ड्राइवर के साथ वाली अगली सीट पर बैठ गया और इस तरह हम दोनों सतगुरु-मालिक के प्यार, उनकी रहमतों की चर्चा करते हुए मैसूर को जा रहे थे। जब हमारे वाली गाड़ी बिड़दी शहर से थोड़ा आगे गई तो अचानक दो मोटरसाइकिल सवारों ने तेजी से हमारी गाड़ी को क्रॉस करके आगे निकाल कर हमारी गाड़ी को रोकने का इशारा किया। पहले तो हमने यह ख्याल किया क्योंकि आजकल समय जो ऐसा है तो यह ख्याल आना भी स्वाभाविक ही था कि कहंी ये लुटेरा ग्रुप से न हों।
फिर साथ में यह भी ख्याल आया कि अपने पास ऐसा कुछ है तो नहीं (यानि सामान आदि) कि लूट लेंगे। तो हमने गाड़ी साइड पर रोक दी। उस समय दोपहर के करीब साढ़े तीन बजे थे। वह दोनों लोग अपने मोटर साइकिल से उतरकर हमारे पास आकर कहने लगे कि आपकी गाड़ी की लेफ्ट साइड में आग लगी हुई है। हमने उन्हें कहा कि हम तो ठीक-ठाक ही जा रहे हैं और गाड़ी में कोई प्रॉब्लम भी नहीं है। तो उन्होंने थोड़ा जोर देकर कहा कि आप अपनी गाड़ी का बोनट ऊपर उठाओ और फिर से गाड़ी को स्टार्ट करें। तो किशोर जी ने गाड़ी का बोनट उठाकर ज्यों ही गाड़ी स्टार्ट की तो गाड़ी में एकदम आग लग गई। उस समय मैं और वह दोनों बाईक सवार भाई गाड़ी के आगे ही खड़े थे और वह दृश्य मैंने भी अपनी आँखों से देखा था।
तो हम सभी ने मिलकर रेत-मिट्टी और कपड़े की सहायता से फटाफट आग को बुझा दिया। तो उनमें से एक शख्स ने कहा कि आपकी गाड़ी का अल्टीनेटर (बैटरी का करंट कंट्रोलर) खराब हो गया है। और उन्होंने हमारे से अपनी हमदर्दी जताते हुए कहा कि आप लोग अवश्य कोई पुण्य कर्म करके आ रहे हैं जो आप बच गए हैं। वरना अल्टीनेटर से निकली आग की छोटी सी चिंगारी से ही पूरी गाड़ी में आग तेजी से भड़क सकती थी और आप लोग भी…! जैसा कि फिल्मों में अक्सर दिखाते हैं।
किशोर जी मुझे कहने लगे कि अल्टीनेटर तो कंपनी से बैंगलुरु में ही मिलेगा, कैसे करें! वह भला इन्सान हमारी बातों को सुनकर व हमारे चेहरे पर से परेशानी को देखकर कहने लगा कि आप घबराओ ना। यहाँ से मात्र 2-3 किलोमीटर पीछे जहाँ से आप क्रॉस करके आए हैं, मेरी अपनी स्पेयर पार्ट्स की दुकान है। आप कहें तो मैं जाकर अल्टीनेटर ले आता हूँ। मेरे पास शायद एक कंपनी का ही ओरिजनल अल्टीनेटर रखा हुआ है। तो उस भाई ने अपने साथी शख्स से कहा कि ऐसा करो कि तुम यह बाइक ले जाकर वहाँ फलाँ जगह पर रखा अल्टीनेटर ले आओ और इतने में मैं गाड़ी से यह खराब अल्टीनेटर को खोलने की कोशिश करता हूँ।
उस शख्स ने किशोर जी को गाड़ी की चाबी-पाना देने को कहा लेकिन गाड़ी में चाबी-पाना आदि कोई ऐसा औजार तब नहीं था। तो उस शख्स ने बड़ी मेहनत से अपने हाथों से उसके नट-बोल्ट खोलकर उस जले व खराब अल्टीनेटर को बाहर निकाल लिया। इतने में वह दूसरा भाई नई पैकिंग में अल्टीनेटर ले आया। उस भले शख्स ने उस नई पैकिंग को हमारे ही सामने फाड़ कर नया अल्टीनेटर उसी जगह पर फिट करके कहा कि गाड़ी को स्टार्ट करके एक्सीलेटर को पूरा दबाओ ताकि तसल्ली हो जाए। गाड़ी बिलकुल ओ.के. थी। वे लोग हमारे लिए फरिश्ता बन कर आए, मानो स्वयं पूज्य गुरु जी ने हमें जलने से बचाने के लिए ही उन्हें भेजा हो। वो आए किधर से यह भी हमें पता नहीं चल पाया था।
वहाँ पर हालांकि गाड़ी बिल्कुल ओके थी लेकिन फिर भी वह भला इन्सान कहने लगा कि मैं दो-चार किलोमीटर तक खुद गाड़ी चलाकर आप लोगों को आगे तक छोड़कर आऊँगा और इससे गाड़ी की ट्रायल भी हो जाएगी। तो वह भाई ड्राइवर सीट पर बैठ गया और किशोर जी उसके साथ ही आगे की सीट पर बैठ गए और पीछे की सीट पर मैं बैठ गया। उस भाई ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी में ड्राईवर सीट के सामने पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां का एक सुंदर फोटो-स्वरूप लगा हुआ था तो पूज्य गुरु जी का वह फोटो देखकर वह भाई कहने लगा कि ये महापुरुष कौन हैं?
तो हमने उसे बताया कि हमारे पूज्य गुरु जी हैं संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां यानि डॉ. एमएसजी! तो उस भले मानस ने सच्चाई जाहिर करते हुए बताया कि हाँ जी, इन्होंने तो हमें भेजा है और यह भी कहा कि येलो कलर की एक आल्टो कार जो अभी-अभी यहाँ से निकली है, उसमें आग लगने वाली है, तो आप लोग जल्दी से जाकर उन्हें बचाओ। उन लोगों की हमारे प्रति इस सच्ची हमदर्दी के लिए हमने उनका दिल से आभार प्रकट किया। धन्यवाद, शुक्रिया अदा किया कि भाई जी आप का बहुत-बहुत थैंक्यू जी और पूज्य पिता जी का देन तो हम दे ही नहीं सकते।
इसी दौरान हमने समिति वाले अपने एक जानकार सेवादार से फोन मिलाकर पूज्य पिता जी के बारे पूछा, तो उन्होंने बताया कि पूज्य गुरु जी दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुँच गए हैं। हम लोग इसी उधेड़-बुन में थे कि पूज्य गुरु जी इन भाइयों को कहाँ पर मिले और ये भाई पूज्य गुरु जी के बारे क्या जानते हैं। हालांकि ये सब हम उन भाइयों से जानना भी चाहते थे लेकिन पता नहीं हम उनसे क्यों नहीं पूछ पाए थे जबकि हमें उनसे यह सच्चाई अवश्य जाननी भी चाहिए थी।
दो-तीन किलोमीटर तक गाड़ी को चलाने के बाद उस भाई ने कहा कि आपकी गाड़ी अब बिल्कुल ठीक है, अब बेधड़क होकर आप ले जाएं। हमने उनसे कहा कि नया अल्टीनेटर और सर्विस आदि सहित जो भी खर्चा हुआ है कृपया हमारे से ले लें जी। तो वह भाई कहने लगा कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, आप रहने दीजिए। लेकिन हमारे बार-बार कहने पर उसने कहा कि चलो जी, आप मुझे 1486 रुपए ही दे दीजिए। हमने जेब में हाथ डाला, तो हम दोनों के पास उस समय मात्र सात सौ रुपये ही निकले।
तो हमारी इस मानसिक स्थिति को भांप कर उस भले शख्स ने कहा कि चलो, ऐसा करो कि मुझे सात सौ ही दे दो और बाकी 786 रूपये आप बैगलुरु आते-जाते समय मुझे मेरी स्पेयर पार्टस की दुकान पर दे देना। मेरी दुकान यहाँ से बिडदी से पहले ही बाहर इसी मेन रोड़ पर है, अपनी हमारे कहने पर उसने पहले जो अपना फोन नम्बर हमें लिखवाया, डॉयल करने पर घंटी कहीं और ही बज रही थी। भाई के फोन पर नहीं बजी।
तो किशोर जी ने कोई दूसरा नंबर देने को कहा। वह कहने लगा…ओ…हो सॉरी। तो उसने दूसरा जो नंबर दिया तो मिलाने पर घंटी उस भाई की जेब में रखे मोबाइल पर ही बजी। उस भाई का साथी भी बाइक से गाड़ी के साथ-साथ ही आया था। हमने उन दोनों का ही एक बार फिर से दिल से शुक्रिया अदा किया और वहां से मैसूर के लिए चल पड़े। लेकिन करीब 15-20 मीटर आगे जाकर हमने गाड़ी रोक ली और पीछे की ओर देखा, न तो हमें वहाँ आस-पास कोई बाइक नज़र आई और न कोई आदमी दिखाई दिया। हमने इधर-उधर भी अच्छी तरह से काफी देखा था।
इतनी जल्दी तो कोई कहीं जा भी नहीं सकता। आखिर वह इतनी जल्दी गए तो गए किधर। हमारी हैरानी की कोई हद भी नहीं रही थी। वह लोग पलों में ही अदृश्य हो गए थे। किशोर जी ने उसी नंबर पर फिर फोन डायल किया, एक-दो घंटी बजी और उपरांत स्विच आॅफ आने लगा। मैसूर तक सफर के दौरान हम कई बार फोन ट्राई करते रहे लेकिन हर बार फोन स्विच आॅफ ही आता रहा।
मैसूर शहर में पहुंच कर किशोर जी ने गाड़ी को सीधे एक वर्कशॉप पर रोककर मैकेनिक से अल्टीनेटर की उपरोक्त अनुसार सारी बात बताते हुए चैक करने के लिए कहा कि आप चैक करें कि यह जो नया अल्टीनेटर डाला है, क्या यह कंपनी का ओरिजलन पार्टस है? तो उसने देख व जांच कर बताया कि हाँ, यह कंपनी का ही है और बिल्कुल ओरिजनल है। उसने यह भी बताया कि यह मैसूर में भी नहीं मिलता। यह तो बैंगलुरु में इस कंपनी से ही मिलता है।
किशोर जी ने मुझे बाद में बताया कि अगले दिन मैंने बैंगलुरु जाते वक्त बिडदी में बाहर मेन रोड़ व आस-पास भी उस भाई द्वारा बताई गई जगह व कार स्पेयर पार्टस की उस नाम की दुकान की काफी तलाश भी की और स्थानीय लोगों से पूछताछ भी की और बार-बार फोन भी ट्राई किया, न तो मुझे वहाँ कोई स्पेयर पार्टस की दुकान ही दिखाई दी और फोन पर तो हर बार स्विच आॅफ ही आया। उसने बताया कि मैं लगभग महीना भर बताए उन नंबरों पर फोन ट्राई करता रहा परंतु दोनों नंबर ही हर बार स्विच आॅफ आते रहे।
मैंने सतगुरु जी की पावन हजूरी में सरसा में साध-संगत के सामने उपरोक्त सारी घटना विस्तार से बताई। इस पर घट-घट की जाननहार खुद-खुदा पूज्य गुरु जी ने फरमाया, ‘बेटा! मालिक अपने बच्चों की रक्षा हजारों किलोमीटर खुद जाकर भी करता है।’ मेरी अपने सतगुरु प्यारे पूज्य हजूर पिता जी के पवित्र चरण-कमलों में यही अरदास है कि तू धन्य है मेरे दाता, तेरे रहमो-करम का उपकार हम निमाणे लोग कभी भी चुका नहीं सकते। दाता जी, अपना अपार प्यार व दृढ़ विश्वास यूं ही बख्शते रहना जी।

































































