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Editorial आपका व्यवहार ही आपकी पहचान बन जाता है -सम्पादकीय

इन्सान समाज में अपनी पहचान खुद बनाता है। इसे लोग किस दृष्टि से देखते हैं यह उसका अपना ही बनाया हुआ एक स्वरूप है। हम अपने आस-पास अक्सर ही देखते हैं कि कोई भला पुरुष है तो उसको भला-नेकदिल इन्सान ही कहा जाएगा और वहीं अगर कोई ईर्ष्यालु, झगड़ालू किस्म का है तो लोग उसे उसी नज़रिये से तोलते हैं। यह सब हमें अपने व्यवहार से ही मिलता है। इसलिए हर किसी को अपने व्यवहार के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है।

आम कहावत भी है कि ‘एक हाथ दे, दूजे हाथ ले’ यह व्यवहार की ही तो झलक है। व्यवहार ही व्यक्ति के जीवन की छाप है, जिसे उसके जाने के बाद भी याद किया जाता है। हम अपने व्यवहार की गहराई तक जाएं तो इसका अर्थ बड़ा गूढ़ होता है क्योंकि यह सिर्फ दुनियावी जीवन-यापन का हिस्सा न होकर हमारे लिए अध्यात्म की राह में भी कदम बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है। अध्यात्म की मंजिल की ओर चलने वाले राही को अपने व्यवहार के प्रति और भी सच्चा-सुच्चा बनना जरूरी हो जाता है। एक गुरु अपने शिष्यों को यह बात समझाने में कोई कमी नहीं छोड़ता।

यही कारण है कि पूज्य गुरु जी अपने अनुयायियों को बार-बार व्यवहार के सच्चे बनने का आह्वान करते हैं। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि अपने व्यवहार के सच्चे बनो। जुबान के धनी बनो। किसी को जुबान दे दी तो दे दी। पुराने जमाने में लोग जुबानों से ही सौदे कर लिया करते थे लेकिन आजकल लोग लिखा हुआ भी मुकर जाते हैं। लोग गुरुओं-पीरों की शिक्षाओं से दूर जा रहे हैं लेकिन सत्संगी को अपने व्यवहार का बड़ा ध्यान रखना चाहिए।

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पूज्य गुरु जी उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि मान लो किसी से आपने पैसे उधार लिए हैं और आपको पता है कि चार महीने में वापिस कर सकता हूँ फिर भी आप उससे पांच महीने का टाईम ले लो और उसको बेशक एक महीना पहले ही वापिस कर दो। ये है इन्सानियत और आपका सच्चा व्यवहार। उसका एक-एक पैसा खुशी-खुशी वापिस कर दो। वो मांगने न आए आपके घर। ये होता है व्यवहार और बात का धनी। वहीं पूज्य गुरु जी लेन-देन में किसी की मदद करने वाले के प्रति भी वचन फरमाते हैं कि अगर आप किसी की मदद करते हैं तो बड़े दिल से करो।

किसी को आपसे जरुरत पड़ गई तो उसको ब्याज पर ब्याज लगाकर उसका शोषण ना करो। उसको इतना परेशान मत करो कि वो जिंदगी से ही तंग आ जाए। यह आपने उसकी मदद नहीं की बल्कि उसको पीड़ा दे दी है। इसलिए एक सत्संगी को सच्चा मददगार होना चाहिए। पूज्य गुरु जी ने साध-संगत को इसके प्रति सजग करते हुए वचन फरमाए कि अगर आपने किसी गरीब जरूरतमंद को पैसे दिए हैं और वापिस करने आया है तो उस पर जो ब्याज है वो ना लिया जाए।

आपका जो मूल है वो ले लो। पूज्य गुरु जी ने पिछले दिनों संगत से इसका प्रण भी करवाया है जैसे अगर किसी अति जरूरतमंद गरीब को उधार दिया है, तो पैसा वापिस लेते समय ब्याज छोड़कर सिर्फ मूल धन वापिस लेंगे, ताकि उस पर बोझ न पड़े। यह है संत सतगुरु की सीख, जो सिर्फ अगले जहान का ही नहीं, बल्कि इस जहान में गुज़र-बसर का हर पाठ पढ़ाता है।

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सच्चे रुहानी संत, गुरु, पीर-फकीर समय-समय पर अपने शिष्यों को जीवन की हर कसौटी पर निखारने का काम करते रहते हैं। वो अपने शिष्यों की हर प्रकार से संभाल करते हैं ताकि उनका जीवन यापन उच्च मर्यादा वाला हो। ऐसे शिष्य समाज में एक उदाहरण तो पेश करते ही हैं, साथ ही उनका रूहानी सफर भी सरलता से तय होता रहता है।

अपने सतगुरु के प्रति दृढ़ विश्वास, सेवा-सुमिरन, परमार्थ और तीन वचनों के पाबंद रहने के साथ-साथ व्यवहार के सच्चे रहना भी रूहानी तरक्की के लिए जरूरी है। साध-संगत भी पूज्य गुरु जी के अनमोल वचनों पर डट कर पहरा देती है। पूज्य गुरु जी का एक-एक वचन उनके लिए जीवन का सार होता है।

पूज्य गुरु जी की पावन शिक्षाओं पर चलते हुए आज डेरा सच्चा सौदा के करोड़ों अनुयायी जिंदगी का हर आनन्द मान रहे हैं।

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