Experiences of Satsangis

Experiences of Satsangis: खुश है ना भाई… -सत्संगियों के अनुभव पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम

प्रेमी धन्ना राम गोदारा, गाँव लालपुरा जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) से शहनशाह मस्ताना जी महाराज की अपार रहमतों का वर्णन इस प्रकार करते हैं:

सन् 1956 की बात है। एक दिन मुझे डेरा सच्चा सौदा सरसा से अपने गाँव लालपुरा जाना था। उस दिन मेरे पास किराए के लिए पैसे कम पड़ रहे थे। मेरे अन्दर ही अन्दर विचार चल रहा था कि क्या करूं? उसी समय घट-घट के जाननहार सच्चे पातशाह मस्ताना जी घूमते-घूमते हमारी तरफ आ निकले। उस समय मेरा बड़ा लड़का हरचन्द नौ वर्ष का था जो मेरे साथ था। शहनशाह मस्ताना जी हरचन्द की तरफ देखकर बोले, ‘अड़े हरचन्द! आज नच्च के नहीं दिखाया वरी…!’

हरचन्द उसी समय शहनशाह जी की पावन हजूरी में नाचने लगा। सतगुरु जी ने फरमाया, ‘वन्ज भैणेयां, वाह भई वाह!’ तथा साथ में दो दस-दस के नए-नए नोट उसके दोनों हाथों में थमा दिए। मेरे मन को फिर लाहनत पड़ी कि देख! तू फिजूल की फिक्र करता है परन्तु शहनशाहों के शहनशाह सबके दिलों की जानने वाले कभी कोई चिन्ता-कमी नहीं रहने देते। एक बार मैंने सरसा से डेरा सच्चा सौदा के किसी काम के लिए डेरा सच्चा सौदा अमरपुरा धाम महमदपुररोही, जिला फतेहाबाद जाना था।

शाम के समय शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने मुझे हुक्म फरमाया, ‘तुम्हें सुबह पहली बस पर महमदपुररोही जाना है।’ परन्तु उसी रात करीब दो बजे होंगे कि बेपरवाह जी ने साधु नियामत राम को कहा कि धन्ना राम को कह दो कि उसने पहली बस पर नहीं जाना है, दूसरी बस पर जाना है। तो मैंने अपने सतगुरु जी का हुक्म माना। पहली बस पर नहीं गया। मैं सर्व-सामर्थ सतगुरु जी के हुक्मानुसार दूसरी बस पर चढ़ा। जब हमारे वाली वह बस हिसार रोड पर सरसा शहर से थोड़ा आगे गई तो मैंने देखा कि पहली बस का एक ट्रक के साथ बहुत भयंकर एक्सीडेंट हुआ पड़ा था।

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उस दुर्घटना में काफी जानी व माली नुक्सान हुआ था। अन्तर्यामी सतगुरु जी ने दुर्घटना होने से पहले ही मुझे उससे दूर कर दिया।एक बार मेरा बिस्तर कुछ सेवादारों के कमरे में लगाया गया। वह जब कमरे की सफाई करते तो मेरे बिस्तर को ऊपर-नीचे कर देते। शायद वह यही समझते होंगे कि यह अनपढ़ बागड़ी हमारे कमरे में कहाँ से आ गया है। मैं सतगुरु जी के हुक्म में ही वहाँ पर सोया करता था। मैं अन्दर ही अन्दर बहुत दु:खी होता।

एक दिन अन्तर्यामी सच्चे पातशाह जी हमारे कमरे में आए, मेरा गंदा बिस्तर स्वयं ही बिछाया और उसी पर लेट गए। जबकि वहीं पर अन्य सेवादारों के बिस्तर साफ व सजे हुए थे। हम सब भी उसी कमरे में आ गए। सतगुरु जी ने फरमाया, ‘धन्ना राम! खुश हैं ना।’ मैंने कहा सार्इं जी! खुश हूँ। सतगुरु जी ने इस बहाने मेरे को बेअन्त खुशियाँ दी। तो उस दिन के बाद वो सेवादार भी मेरे से सद्व्यवहार करने लग गए।

पूरा सतगुरु स्वयं ही अल्लाह, खुदा, राम, रहीम, रब्ब, कुल मालिक, परमेश्वर, गॉड, वाहेगुरु का ज़ाहिरा प्रकट स्वरूप इन्सानी शरीर धारण करके जीवों के हित के लिए दुनिया में आता है। वह तीनों कालों को जानने वाला अन्तर्यामी होता है। भविष्य में उसे होने वाली हर बात का पहले से ही पता होता है।

सतगुरु जहाँ तक जानता है इन्सान वहाँ तक की सोच पहुँच नहीं सकती। सतगुरु सर्व-सामर्थ है और वह जो चाहे कर सकता है। वह जीव की सच्ची पुकार सुनता है और उसकी हर जगह सम्भाल भी करता है। जैसा कि उपरोक्त अनुसार स्पष्ट है।

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