Experiences of Satsangis अभी नहीं लेणी, मौके पर पूले ही खरीदने हैं।’ -सत्संगियों के अनुभव: पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज की दया-मेहर
प्रेमी धन्ना राम गोदारा, गाँव लालपुरा, जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) से पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी महाराज की अपार दया-मेहर का वर्णन इस प्रकार करते हैं-
सन् 1951 की बात है। जब मैं पहली बार डेरा सच्चा सौदा सरसा में आया तो उसी समय शहनशाह जी ने रहमत करके मुझे सदा के लिए अपना बना लिया। मैं डेरा सच्चा सौदा में सेवा करने लगा। मुझे हाथों से चलाने वाली चक्की से आटा पीसने की सेवा मिल गई क्योंकि उन दिनों चक्की पर ताजा आटा पीसकर ही लंगर बनाया जाता था। उस समय के दौरान बागड़ में (राजस्थान) सूखा पड़ने की वजह से अकाल पड़ा हुआ था।
सच्चे पातशाह जी के हुक्म से मैं अपने परिवार को भी यहाँ सरसा शहर में ले आया था। बेपरवाह जी के हुक्मानुसार परिवार-जनों ने एक गाय और एक भैंस रखी हुई थी। मैं सारा दिन मेहनत करता, रात को डेरे में चक्की से आटा पीसता और मालिक के नाम का सुमिरन करता। रात के समय मैं डेरे में ही सोता क्योंकि मुझे रात को घर जाने का हुक्म नहीं था।
उस समय मेरा लड़का हरचन्द चार-पांच वर्ष का था। एक दिन वह मेरे साथ डेरे में आ गया।
उस दिन मैं तेरावास में सेवा कर रहा था। सारा दिन गुजरने पर शाम के समय मुझे ख्याल आया कि हरचन्द कहाँ है! मैंने उसे डेरे में इधर-उधर देखा तो मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दिया। मैंने अपने सतगुरु बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के चरणों में अर्ज़ की कि बाबाजी! हरचन्द पता नहीं किधर चला गया है। तो सच्चे पातशाह जी ने फरमाया, ‘हरचन्द घर पहुँच गया है।’ मेरा दिमाग चकरा गया कि छोटा-सा लड़का है! टेढ़ा-मेढा रास्ता है! वह इतनी दूर कैसे चला गया! जब मैंने घर जाकर पता किया तो हरचन्द सचमुच ही घर पहुँच गया था।
मैंने उन दिनों ज्वार की कड़बी पशुओं के लिए खरीदनी थी। सूखा पड़ने की वजह से पशुओं का चारा बहुत महंगा था। मैंने नेकी राम से कुछ खड़ी ज्वार मोल ले ली, ताकि काट कर पूले बना कर रख लूंगा। अगले दिन शहनशाह जी ने जो कि घट-घट की जानने वाले हैं मुझसे पूछा, ‘अड़े, पशुओं के लिए क्या इन्तजाम किया है?’
‘बाबा जी! नेकीराम से खड़ी ज्वार मोल ली है।’
‘अड़े! हम से ना पूछेया, इसरार से पूछ के बताते।’
‘बाबा! कड़बी और लेनी है, यह तो बस नाम मात्र ही ली है।’
‘अच्छा वरी! कल इसरार से पूछ के बताएंगे।’
जब दूसरा दिन आया तो मैंने अपने भोले भाव से पूछा, ‘बाबा! वो कड़बी आलो इसरार सूं पूछ लियो कै?’ (वो कड़बी वाला इसरार से पूछ लिया क्या?) ‘हाँ! पूछ लिया। इसरार ने बोला अभी नहीं लेणी, मौके पर पूले ही खरीदने हैं।’ मैंने ज्वार और नहीं ली। वचनों पर विश्वास किया। जब चार महीने बाद जरूरत पड़ी तो रेलगाड़ी से शहर में इतनी सूखी ज्वार की कड़बी आई कि उसके खरीदने वाले ग्राहक बहुत कम थे तथा नाम मात्र के भाव से मैंने जरूरत अनुसार कड़बी खरीद ली।
बेपरवाह शहनशाह जी की हर एक बात करिश्मा थी, जिसे मेरे ख्याल से शब्दों में वर्णन करना बहुत मुश्किल काम है। यदा-कदा वो बीते दिनों के मंज़र ख्याल फिल्म की तरह अब भी चलते रहते हैं तथा कई बार अकेले में जोर की हंसी भी आ जाती है। पोते-पड़पोते पूछते हैं ‘अकेले में क्यों हँस रहे थे?’ जवाब देता हूँ कि कुछ नहीं, वैसे ही।
मैं परिवार को समझाता हूँ कि मैं भी समय का पूरा लाभ नहीं उठा पाया। अब आप हजूर पिताजी के प्रेम का भरपूर लाभ उठाओ ताकि फिर पछताना ना पड़े। (प्रेमी धन्ना राम जी मालिक के चरणों में ओड़ निभा चुके हैं।)
































































