Experiences of Satsangis

Experiences of Satsangis: ले भाई! तुझे राखी देते हैं, बांध…! -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर

प्रेमी चंद सिंह इन्सां सुपुत्र श्री भजन सिंह निवासी श्री गुरु अंगद देव जी नगर श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब) से अपने सतगुरु दाता रहबर परम पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की खुद पर हुई रहमतों का निम्न अनुसार वर्णन करते हैं:-

प्रेमी जी बताते हैं कि नाम-शब्द लेने से पहले मुझमें शराब पीने, मांस खाने सहित और भी अनेकों बुराइयाँ थी और इसके अलावा एक और बहुत गंदी आदत कि मैं डेरा सच्चा सौदा की बहुत निंदा किया करता था। हालांकि मैंने तब तक डेरा सच्चा सौदा को देखा भी नहीं था, न कभी परखा था, बस यही मुझमें बहुत बुरी आदत थी। ‘जैसी रहिणी-बहिणी वैसी बोल-वाणी’, पंजाबी की इस कहावत के अनुसार तब मेरी ज्यादातर बैठ-उठ ऐसे ही लोगों के साथ थी।

हालांकि मैं एक अच्छा पढ़ा-लिखा इन्सान हूँ और तब मैं सरकारी नौकरी में भी था। अच्छी सैलरी हर महीने एक तरह से घर बैठे ही लगभग पहली-दूसरी तारीख को मिल जाया करती। मैं एक बात यह भी बता दूं कि मांस-मिट्टी, शराब आदि खाने-पीने तथा इस चुगली निंदा की गंदी आदत जैसा कि महापुरुषों के भी वचन हैं कि निंदा तो चाहे किसी की भी है, बहुत ही बुरी चीज है और डेरा सच्चा सौदा, जिसके साथ तब तक मेरा कोई वास्ता भी नहीं था, उनकी निंदा! बहुत अफसोस है! मैं अपने-आपको कभी माफ नहीं कर सकता।

भला ऐसी पाक-पवित्र संस्था ने मेरा क्या बिगाड़ा था परंतु फिर भी मैं डेरा सच्चा सौदा की निंदा क्यों करता था यह विषय मेरी भी सोच-समझ से परे था। हालांकि दूसरी तरफ मेरी शराब आदि बुराइयों की वजह से ही मेरे अपने यानि मेरा परिवार भी मुझसे बहुत परेशान था यानि एक तरह से इन बुराइयों की वजह से मेरा घर टूट गया था और मेरे अपने भी सब मुझ से रूठ गए थे। समाज में हम लोग आम ही देखते हैं कि आदमी दूसरों की बुराइयां तो बढ़-चढ़कर गाता है लेकिन अपनी खुद की बुराई शायद ही कोई बताता हो लेकिन डेरा सच्चा सौदा के साथ जुड़ने के बाद ही मैं अपनी बुराइयां बताने की हिम्मत जुटा पाया हूँ।

तब डॉक्टर साहिबानों व मेरे शुभचिंतकों ने भी मुझे शराब छोड़ने के लिए बहुतेरा कहा था कि चंद सिंह तूं शराब पीना छोड़ दे वरना वह दिन दूर नहीं कि यही तेरी जान की दुश्मन बन जाएगी। कुछ समझदार लोगों ने यह भी कहा कि यह आदत अपने आप तो नहीं छूटती परंतु कहते हैं कि डेरा सच्चा सौदा वाले बाबा जी कोई ऐसा नाम-शब्द बताते हैं कि जिससे शराब आदि सभी नशे एवं और सभी बुराइयां छूट जाती हैं। इस वास्तविकता को मैं तब तक जान भी चुका था क्योंकि मेरे गांव थांदेवाल (पहले हम इसी गांव में ही रहा करते थे) के काफी लोग जो सच्चा सौदा जाते हैं, वह अपनी ऐसी सब बुराइयाँ छोड़ चुके हैं।

पंजाबी ’च कहिंदे ने कि ‘मौत अग्गे भूत वी नच्चदे ने’, तो मौत के भय (मैं अभी मरना नहीं चाहता था) के कारण एक दिन मैंने भी प्रण कर लिया कि डेरा सच्चा सौदा वाले संतों (पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) के सत्संग में जाकर मैं भी अपनी इस गंदी आदत को हमेशा के लिए छोड़कर आऊंगा।

सन् 1981 की बात है, उसी दौरान एक दिन मुझे पता चला कि डेरा सच्चा सौदा वाले पूजनीय संत जी श्री मुक्तसर साहिब में प्रेमी श्री परमजीत सिंह इन्सां (कनाडा वाले) के घर पर पधारे हैं और वहीं पर ही आज नामाभिलाषी जीवों को नाम शब्द की दात भी बख्शेंगे। मेरे अंदर भी तड़प जगी कि मैं भी जल्दी से वहाँ पहुँच कर नाम-शब्द लूं। लेकिन जब मैं वहाँ पहुँचा तब तक पूजनीय परमपिता जी उन अभिलाषी जीवों को नाम-शब्द के बारे समझा कर नाम भी लगभग दे चुके थे।

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मैं ही लेट हो गया था। फिर भी मैंने कोशिश की और घर के अंदर भी चला गया था, लेकिन ड्यूटि पर खड़े सेवादारों ने अंदर जाने से मना कर दिया कि पिताजी तो जीवों को नाम-शब्द लगभग दे चुके हैं। उन्होंने मेरी तड़प को जानकर कहा कि भाई अगर आपने नाम-शब्द लेना ही है तो आने वाले रविवार (उसी महीने का शायद वह दूसरा रविवार था) को पिता जी मलोट दरबार में सत्संग भी करेंगे और नाम-शब्द भी देंगे, तो आप मलोट दरबार में आ जाना।

पूजनीय सतगुरु जी के दर्शन तो मैंने उसी दिन श्री मुक्तसर साहिब में परमजीत सिंह के घर के बाहर गली में कर लिए थे। गली में उस समय आस-पास व शहर की काफी संगत पिताजी के दर्शनों के लिए खड़ी थी तो इस प्रकार मैंने भी वहीं पर साध-संगत में खड़े होकर सतगुरु जी के दर्शन कर लिए थे। अपने गुनाहों (डेरा सच्चा सौदा की निंदा करने) की माफी मैंने अपने मन में तौबा करके सतगुरु जी से मन ही मन माँग ली थी।

सतगुरु प्यारे के दर्शन करके मेरे मन ने मान लिया था कि ये संत जी, ये बाबा जी तो खुद परमपिता परमात्मा का साक्षात स्वरूप हैं। तो नाम-शब्द लेने की मेरे अंदर की तड़प और भी प्रबल हो गई कि कब वह समय आएगा। तो वह निश्चित दिन भी आ गया। लेकिन मन में यह हलचल मच गई थी कि आज तो दशहरे का त्यौहार है। मैं अपनी बात कह रहा हूँ कि मैंने अपनी जिंदगी में दशहरा त्यौहार देखना पहले कभी मिस नहीं किया था। लेकिन मन की इस उठक-पटक के बीच मैं मलोट दरबार में पहुँच गया। बहुत साध-संगत पंजाब तथा साथ लगते अन्य स्थानों से सत्संग में आई हुई थी।

मैंने वहाँ सत्संग पंडाल में साध-संगत में बैठकर सतगुरु प्यारे का रूहानी सत्संग सुना और सत्संग के बाद उसी दिन ही पूजनीय परमपिता जी से नाम-शब्द की अनमोल दात भी प्राप्त कर ली। नाम शब्द लेने वाले काफी संख्या में जीव बैठे हुए थे। तब तक मेरे मन के सारे भ्रम, सभी शंकाएं आदि हर नेगेटिव चीज़, सभी नेगेटिव विचार बिल्कुल खत्म हो चुके थे। भाइयो! मैं यहाँ पर यह भी बताना चाहता हूँ कि मुझे ऐसे सतगुरु जी मिले कि उन्होंने मेरी बुराइयों को जड़ से ही खत्म कर दिया है।

उसके बाद तो चल सो चल, सरसा-मलोट-यूपी दरबार में जहाँ भी सत्संग होता तो मैं भी अपने गांव की साध-संगत के साथ सत्संग में पहुँच जाता और जैसी बन पड़ती जो भी सेवा मिलती, साध-संगत की सेवा भी करता। तो सत्संग, सुमिरन व सेवा का ही प्रभाव था कि जिसने मेरे अंदर की बुराइयों को धो डाला। और इतना ही नहीं, उस दिन के बाद मैं अपने मन में, जो भी जायज सोचता पूज्य सतगुरु जी अगले ही पल उसे तुरंत पूरा भी कर देते।

निम्न अनुसार एक दिलचस्प घटना जो मैं बताने जा रहा हूँ, वह सन् 1986 की है, तब मैं अपने गाँव थांदेवाल से श्री मुक्तसर साहिब शहर में आकर रहने लगा था। उस दिन राखी का त्यौहार था, अचानक यह सोचकर मैं बहुत दुखी, बहुत गमजदा हो गया कि काश! मेरी भी एक सगी बहन होती जो मेरी कलाई पर आज अपने हाथों से मुझे राखी बांधती।

मेरे बहन-भाई, माँ-बाप तो सब थे लेकिन समय आने पर वे सब लोग भगवान को प्यारे हो गए थे। मैं अकेला ही रह गया था। उस दिन मुझे अपनी सगी बहन की बहुत याद आई। मैं अपनी बहन की याद की तड़प में पूजनीय परमपिता जी के पावन स्वरूप के आगे खड़े होकर बिलख-बिलख कर रो पड़ा। मेरी आँखों से आंसू रूक नहीं रहे थे कि हे सतगुरु जी, आपके बिना मेरा और कोई भी नहीं है कि जिसके साथ मैं अपना दु:ख-सुख सांझा कर पाऊँ।

तू ही मेरा बाप, मेरी माँ, मेरी बहन, मेरा भाई और मेरा सब कुछ तू ही है। इस प्र्रकार पूज्य सतगुरु जी को अपनी तड़प अपने दुखड़े सुनाकर मैंने अपने आप को अंदर से कुछ हल्का-फुल्का सा महसूस किया। उपरांत सतगुरु जी के पावन स्वरूप के आगे श्रद्धापूर्वक नमन कर मैं फिर अपने काम में लग गया।

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उस घटना के करीब दो महीने बाद की बात है, उस दिन महीने का दूसरा रविवार था और पूजनीय परमपिता जी मलोट दरबार में सत्संग फरमाने के लिए पधारे थे। मैं भी साध-संगत के साथ पूजनीय परमपिता जी के पावन दर्शनों के लिए दरबार में स्थित पानी की डिग्गी, जो तेरावास के लगभग सामने ही थी, वहाँ पीपल की छाया में बैठा हुआ था। अचानक एक सेवादार प्रेमी स. पिरथी सिंह गांव कौड़ियांवाली वाला तेरावास से सीधे ही मेरे पास आए और मुझे अपने साथ ले जाकर तेरावास के प्रांगण में बिठा दिया।

वहाँ अंदर का मनमोहक दृश्य देखकर मेरा तन-मन खिल गया। वहाँ पूजनीय पिता जी सेवादारों को उनकी सेवाओं के अनुसार प्रेम निशानियां, अपनी प्यारी दातें अपने ही पवित्र कर-कमलों से बख्श रहे थे। मेरी भी बारी आई। मैंने उठकर पूजनीय परमपिता जी की पावन हजूरी में श्रद्धापूर्वक सजदा करके नारा लगाया। इस दौरान पूजनीय परमपिता जी ने अपने सामने रखी कुछ राखियों में से एक राखी अपने पवित्र कर कमलों में लेते हुए फरमाया, ‘वाह भई वाह! बल्ले-बल्ले!! इसमें तो सारे रंग हैं।

ले भई, तुझे राखी देते हैं बांध।’ तो वहीं सेवादारों में बैठा एक सेवादार भाई मुझे कहने लगा कि इसे जेब में डाल ले! तो उसकी यह बात सुनते ही पूजनीय परमपिता जी जोश में बोले ‘क्यों भाई, जेब में क्यों डाले! इसे हम सरेआम दे रहे हैं! यह कोई चोरी का माल है!’ उपरांत दाता जी ने मुझे संबोधित करते हुए फरमाया ‘भाई! इसे हाथ पर बांध!’ तो वहाँ पर ही बैठे एक सेवादार ने मेरी कलाई पर राखी बांध दी।

तो पूजनीय परमपिता जी ने फिर फरमाया, ‘भाई तू यह बंधी राखी सभी को दिखा।’ तो मैंने अपने प्यारे सतगुरु जी के वचनानुसार खड़े होकर वहाँ तेरावास में पावन हजूरी में बैठे सभी सेवादारों को ‘ऐसे’ घूम-घूमकर प्यारी दात (सतगुरु जी की) कलाई पर बंधी राखी, सभी को दिखाई। उपरांत सतगुरु जी ने फरमाया, ‘भाई! तूने इसे (राखी)बांधे ही घर ले जाना है।’ और मैं अपने दाता प्यारे के पावन वचनानुसार राखी बांधे हुए ही अपने घर पर गया।

मुझे अंदर से एक बहुत ही अजीब-सा भय था कि यह अति अनमोल दात भीड़-भाड़ में कहीं गिर न जाए। मेरा यह भय किसी हद तक सही था, वह मेरे मन का भ्रम था, मालिक जाने। तो मैंने राखी पर अपना रूमाल निकाल कर बांध लिया था। सतगुरु जी की उस पवित्र निशानी को पाकर मुझे इतनी खुशी महसूस हुई कि खुशी के मारे जमीन पर मेरे पाँव नहीं टिक रहे थे। मेरी जो तड़प थी और जो-जो भी मैंने बेपरवाह जी के पावन स्वरूप के आगे उस दिन रो-रोकर अर्ज़ की थी, अंतर्यामी सतगुरु घट-घट की जाननहार दाता जी ने मेरी वो हर इच्छा पूरी कर दी थी।

अब जब भी राखी का त्यौहार आता है, तो संभाल कर रखी सतगुरु जी वाली वह राखी रूपी प्रेम निशानी को पवित्र हृदय से अपने माथे से लगाकर और सतगुरु जी के पवित्र चरणों में सजदे में सिर झुकाकर नारा लगाता हूँ और इसके साथ ही उस मौके पर हुए बेपरवाही अनमोल वचनों को याद कर अत्यंत खुशी को महसूस करता हूँ और वही पवित्र निशानी प्यारी सी राखी अपनी बेटियों के हाथों अपनी कलाई पर बंधवा लेता हूँ।

मैं अपने सतगुरु प्यारे का जितना भी शुक्राना करूँ कम ही कम है। और करूँ भी क्यों नां! क्योंकि मेरे रहबर प्यारे ने मुझ बुराइयों के पुतले के सभी गुनाहों को माफ कर मुझे भी अपना प्रेमी-भक्त बना लिया है। सतगुरु दाता जी को बारम्बार सजदा, धन्य-धन्य, धन्यवाद और धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा पवित्र नारा प्रवान होवे जी।

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