दिमाग की सफाई
किसी शायर ने क्या खूब लिखा है-
हमने ज़िंदगी को कुछ यूँ आसान कर लिया,
कुछ से माफी माँग ली, कुछ को माफ कर दिया।
किसी ने आपके साथ बुरा किया, जानबूाकर या अनजाने में। आप क्यों न्यायधीश बनकर उसे सजा सुनाने लगते हैं? क्या उसके लिए भगवान नहीं है? वो तो सब देख रहा है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा यह तो तय है। तो आपके बुरा मानने या दिल में उसके प्रति द्वैष रखने से क्या होगा? यकीन मानिए ऐसा करके आप उसको नहीं बल्कि खुद को सजा दे रहे हैं।
‘जिस तरह रोज़ सुबह बाहर की सफाई करते हैं, उसी तरह रोज़ रात को दिमाग की सफाई करेंगे। अगर किसी ने हमारे साथ बुरा किया है तो उसे भुलाकर हर रोज़ नया दिन शुरू करेंगे।’ साध-संगत ने जब यह प्रण किया तो पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि है तो यह मुश्किल पर आपको इसके लिए रियायत दे देते हैं। एक तो आप खुद से हुई गलतियों के लिए सतगुरु से माफी माँगो कि सतगुरु जी, मुासे ये गलती हो गई, मुो माफ कर देना जी। फिर जिसने आपके साथ बुरा किया है, अगर आप उसे माफ कर देते हैं तो सतगुरु आपकी सभी गलतियों को भी माफ कर देगा।
अगर आप यह प्रण अपने जीवन में धार लेते हैं तो ज़िंदगी सच में कितनी आसान हो जाएगी, आप करके देखें तो जरूर जान पाएंगे। दिलो-दिमाग में किसी के प्रति द्वैष भाव को निकालकर उसके प्रति अपना मन साफ कर लेने से ना सिर्फ आपके अंदर अच्छे-नेक विचार पैदा होंगे, बल्कि प्रभु के प्रेम और समर्पण की भावना भी जागृत होगी।
मेरी एक सहेली थी, हमेशा जली-भुनी रहती। दुनिया से कटी, माथे पर त्यौड़ियाँ सजाए। पता नहीं सारा दिन कैसे निकालती थी! उसकी बातों में हमेशा किसी न किसी के प्रति खुंदक ही रहती थी। आखिर थी तो सहेली। एक दिन मैंने उसकी बातों को गहराई तक जानने की कोशिश की। पता नहीं, कब की बातें वो अपने दिमाग में रखे बैठी थी कि फ्लां ने मुो 2015 में ऐसा कहा था! उसने पिछले साल मेरा साथ अच्छा नहीं किया! पिछली बार जब रिजल्ट आया था उसने मुो विश नहीं किया आदि। ऐसी न जाने क्या-क्या बातें उसके दिमाग में भरी थी।
मैंने उससे कहा, ‘इन बातों को हुए कितना टाईम हो गया! तुम अभी भी इन बातों का कचरा अपने दिलो-दिमाग में रखे बैठी हो! जैसे हम रोज़ अपने घर की सफाई करते हैं, वैसे रोज़ अपने दिमाग की सफाई क्यों नहीं करती?’ ‘दिमाग की सफाई? ये कैसे होती है?’ उसका सवाल था।
‘हाँ, मैं तो हर रात को सोने से पहले अपने दिमाग की सफाई कर के सोती हूँ।’ मैंने कहा तो वो हैरानी से मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी। मैंने उसे बताया, ‘सेंट डॉ़ एमएसजी के वचन हैं कि हर रात को सच्चे दिल से 5 मिनट सुमिरन करके दिनभर में हुई गलतियों की माफी अपने सतगुरु से माँगी जाए तो उनका लेखा-जोखा खत्म हो जाता है और अगले दिन आप बिल्कुल टैंशन फ्री। नए सिरे से अपना दिन शुरु कर सकते हो।
इससे ना सिर्फ मानसिक शांति मिलती है, बल्कि दिल भी हल्का व स्फूर्ति भरा महसूस होता है।’ वो कहने लगी, ‘वो तो खुद के लिए सही है लेकिन जिन्होंने हमारे साथ बुरा किया वो…! उसका क्या?’ ‘अगर किसी ने आपके साथ अच्छा किया तो उस अच्छाई को अपने साथ लेकर चलो और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखो लेकिन अगर किसी ने तुम्हारे साथ बुरा किया है तो उसकी डोर अपने सतगुरु के हाथ में छोड़ दो कि मालिक तू जाने, तेरा काम जाने।
जिसने भी जो कुछ किया उसके प्रति अपना मन साफ कर लो और आगे बढ़ो। है तो ये बहुत मुश्किल पर यकीन मानो तुम्हें अपने अंदर बहुत शांति अनुभव होगी। ऐसा करके तुम कोई बहुत महान काम नहीं कर रहे, बल्कि तुम अपने आपकी मदद कर रहे हो।’ ‘अपने आपकी मदद…! वो कैसे?’
‘जब तक तुम अपने दिमाग में दूसरों के प्रति गलत भाव का कचरा भरे रखोगी, तब तक तुम अपने दिमाग को नए विचारों और सद्भावों के लिए तैयार ही नहीं कर पाओगी।’ ‘लेकिन कई बार कोई व्यक्ति ऐसी बात कह देता है कि उसका जवाब दिए बिना रहा नहीं जाता। दिल करता है र्इंट का जवाब पत्थर से दें। अगर मैंने कुछ ना कहा तो कहीं मुो लोग दबाने ही न लग जाएं। मेरी तो इमेज ही खत्म हो जाएगी।’
‘हा… हा… हा… होता है, ऐसा भी होता है लेकिन तुम्हें इससे ऊपर उठकर अपने बारे में सोचना है। अगर किसी ने कोई गलत बात कह दी तो उसी टाईम उसका जवाब देने की बजाए अपने आपको कुछ वक्त दो, ताकि ताव में आकर तुम भी वही गलती ना कर बैठो जो उसने की। इस टाईम को ‘कूलिंग पीरियड’ कहते हैं। इस समय में तुम्हारा मन कुछ तो अपने आप ही शांत हो जाएगा और कुछ तुम्हें उस मसले को समाने का मौका मिलेगा।
तुम जब कुछ देर रूक कर बात करोगे तो सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुलााने की बात करोगे।’ ‘हाँ, ये बात तो सही है! लेकिन जो उबाल उठता है दिल में वो!’ ‘उबाल किसलिए? तुम ही बताओ कि दिलो-दिमाग में कौन रहता है?’ ‘मेरे गुरु रहते हैं यानि कि ‘एमएसजी’।’
‘तो क्या तुम अपने गुरु के रहने की जगह की रोज़ सफाई नहीं करना चाहोगी? सोचो! अगर पिताजी तुम्हारे घर आएं तो तुम अपना घर कैसे सजाओगी?’ ‘अरे मेरा बस चले तो ऐसा सजाऊँ गी कि सारी दुनिया देखकर दंग रह जाए और पिताजी खुश हो जाएं।’ ‘तो फिर बस! पहले अपने दिलो-दिमाग रूपी घर को सतगुरु के रहने के लायक बनाओ और उसमें हमेशा ‘प्रेम’ रूपी फूलों की सजावट करके रखो, ताकि वह खुशी-खुशी वहाँ रह सकें।’
‘ये तो तुमने बहुत ही अच्छी बात कही। अब मैं अपने दिलो-दिमाग को ऐसे ही सजाऊंगी और अपने सतगुरु को प्यार से उसमें रखूंगी।’































































