Daughters: घर का नूर होती हैंबेटियां
समाज में बेटियों को हर क्षेत्र में बेटों के समान अधिकार दिलाने के लिए डेरा सच्चा सौदा ने कई जागरूकता मुहिमें चलाई हैं जिनका सुखद परिणाम आज समाज में दिखाई देने लगा है। पूज्य गुरु संत डॉ. एम.एस.जी ने बेटियों के उत्थान और सम्मान के लिए बडेÞ स्तर पर प्रयास किए हैं।
समाज में बेटी के रूप में पैदा होना कोई गुनाह या पाप नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का एक अति सुंदर आशीर्वाद है। क्योंकि विज्ञान के मतानुसार लिंग का निर्धारण केवल पिता के गुणसूत्रों पर निर्भर करता है, इसलिए इसमें माँ या बच्ची का कोई दोष नहीं होता है। फिर भी दुर्भाग्य से, समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता, दहेज प्रथा और लड़कों को प्राथमिकता देने की मानसिकता के कारण बेटियों को बोझ या हीन समझा जाता है।

समाज में गिरते लिंगानुपात को सुधारने के लिए डेरा सच्चा सौदा ने ऐसे महान 5 मोती समाज की सेवा में समर्पित किए हैं जिनमें भ्रूण हत्या रोकना, दहेज प्रथा को खत्म करना, बेटे-बेटी में भेदभाव नहीं करना, बेटियों को बेटों के समान परवरिश देना और बेटियों से वंश चलाना शामिल है।
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लिंगानुपात सुधार में डेरा सच्चा सौदा की अनोखी पहल
कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ उठाई आवाज़
डेरा सच्चा सौदा द्वारा अपनी स्थापना यानि सन् 1948 से ही कन्या भू्रण हत्या जैसे जघन्य अपराध को रोकने का प्रयास शुरु कर दिया गया था। उस समय समाज में बेटियों को अभिशाप के तौर पर देखा जाता था, जिसके चलते बहुतेरे लोग बेटियों को जन्म लेने से पहले ही कोख में मरवा देते थे। यही नहीं, जिस घर में बेटियों की संख्या ज्यादा होती, उनको तिरस्कार की नज़र से देखा जाता था। डेरा सच्चा सौदा की पहली पातशाही पूज्य सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज ने अपनी सत्संगों में इस सामाजिक बुराई के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। पूज्य सार्इं जी सत्संगों में आमजन को जागरूक करते कि बेटियों के बिना संसार की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि बेटियाँ ही तो हैं जो वंश को आगे बढ़ाती है।
आत्म सम्मान एवं समान परवरिश देना
पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (डॉ. एमएसजी ) ने लिंगानुपात सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अभिभावकों से बेटे-बेटियों को एक जैसी परवरिश देने का आह्वान किया। डेरा सच्चा सौदा से जुड़े करोड़ों लोग आज बेटा-बेटी में शिक्षा, खान-पान, आचार-व्यवहार में किसी तरह का भेदभाव नहीं करते अपितु बेटियों को बेटों से बढ़कर प्यार-दुलार देते हैं। बेटियों का आत्म सम्मान बढ़ाने के लिए सिलाई, कढ़ाई व अन्य व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र खोले गए हैं। वहीं ‘सशक्त नारी मुहिम’ के तहत लड़कियों को आत्मरक्षा हेतु प्रशिक्षण दिया जाता है।
बिना दहेज के सादगीपूर्ण विवाह-शादी
समाज में फैली दहेज की विकृति ने न जाने अब तक कितनी ही बेटियों का जीवन बर्बाद कर दिया है। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने समाज की इस दुखती नब्ज को पकड़ते हुए एक पवित्र परम्परा का आगाज़ किया। आपजी ने साध-संगत की हजूरी मेें सत्संगी परिवारों को अपने विवाह योग्य बच्चों की बिना दान-दहेज के शादी करने का आह्वान किया तो संगत ने आपजी के इन वचनों को सत्वचन कहकर माना। इस परम्परा में दोनों परिवारों की आपसी सहमति से डेरा सच्चा सौदा में दिलजोड़ माला पहनाकर व कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद शादी की रस्म पूरी होती है। यह परम्परा आज भी डेरा सच्चा सौदा में ज्यों की त्यों चल रही है, अब तक लाखों नहीं, अपितु करोड़ों परिवार इसका निर्वाह करते हुए सुखमई दाम्पत्य जीवन जी रहे हैं।
समानता का अधिकार (भेदभाव रहित) देना
पूज्य गुरु संत डॉ. एमएसजी ने बेटियों को हर सामाजिक सरोकारों में बराबर की हिस्सेदारी देने की बात उठाई है, जिसका समाज में बड़ा अनुकूल प्रभाव देखने को मिला। बेटियों को अब परिवार के हर सामाजिक कार्य में बराबर की भागीदारी मिलने लगी है। समाज में इतना बदलाव आया है कि अब बेटियां बेटों की तरह परिवारिक सदस्यों की अंतिम यात्रा में अर्थी को भी कंधा देने लगी हैं। वहीं डेरा सच्चा सौदा की ओर से ‘जननी सुरक्षा मुहिम’ के तहत गरीब गर्भवती महिलाआें को पौष्टिक आहार देकर उनका ईलाज करवाया जाता है। जबकि ‘जननी-शिशु सुरक्षा’ के तहत गरीब जच्चा-बच्चा का भरण-पोषण करने जैसे कार्य भी चला रहा है ताकि समाज में बेटियों के प्रति लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव हो।
बेटी से वंश चलाने की शुभ शुरुआत































































