दीपक की भाँति प्रकाशमान बनें

मनुष्य को सदा दीपक की भाँति प्रकाशमान होना चाहिए। दीपक को यदि अन्धेरे कक्ष में जला दिया जाए तो वह अन्धकार को दूर करके उस कमरे को प्रकाशित करता है। उस समय यह पता ही नहीं चलता कि उस कमरे में कभी अन्धेरे का साम्राज्य था। उसी तरह मनुष्य को अपने सद्गुणों से चारों ओर अपना प्रकाश फैलाना चाहिए। मनुष्य इसीलिए मनुष्य कहलाता है कि वह अपने परिवेश में चारों ओर रहने वाले दूसरे लोगों की सुधबुध लेता रहे। उनके सुख-दु:ख को समझे और उनके साथ खड़ा रहे।

जब सूर्य का प्रकाश तीव्र होता है, उस समय किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। उसके उपस्थित न होने पर ही अन्धकार अपने पैर पसारने लगता है। ऐसे समय में यदि एक छोटा-सा दीपक अन्धेरे कमरे में रख दिया जाए तो उसके प्रकाश से कमरे में उजियारा हो जाता है। वहाँ पर रखी हुई सभी वस्तुएं स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती हैं। वहाँ पर चलने-फिरने वाले लोगों का आवागमन इस प्रकार सुविधापूर्वक होने लगता है कि वे ठोकर खाकर गिरने से बच जाते हैं।

Light a lamp everyday to purify the environmentजिन मनुष्यों को उनके शुभकर्मों के कारण ईश्वर ने सामर्थ्यवान बनाया है, उनको चाहिए कि वे समाज के पिछड़े वर्ग के लिए दीपक की भाँति बनें। उनकी समस्याओं को सुनकर और समझकर उनकी उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए। उन लोगों के चेहरों पर यदि वे थोड़ी-सी प्रसन्नता भी ला पाएँ तो उनका मानव जीवन पाना वास्तव में सफल हो गया समझिए। वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जो अपने देश, धर्म व समाज के लिए कुछ कर गुज़रने का साहस रखता हो। जिस प्रकार दीपक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, धर्म-जाति आदि सभी प्रकार के बन्धनों से ऊपर उठकर सबको बराबर प्रकाश देता है, उसी प्रकार ये महापुरुष भी सबको एक समान मानते हैं। तथावत अपने दायित्वों को पूर्ण करने में संलग्न रहते है।

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अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं। इन्सान और अन्य जीवों में कुछ अन्तर तो होना आवश्यक है। मनुष्य को ही ईश्वर ने सोचने-समझने की शक्ति का वरदान दिया है। इसीलिए वह सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट प्राणी कहा जाता है। हमारे ऋषि-मुनियों का मानना है कि सभी जीवों की भोगजून होती है। उस जून में वे केवल अपने अशुभ कर्मों का दण्ड भोगते हैं। केवल मनुष्य जीवन ही कर्मजून होता है जिसमें शुभाशुभ सभी प्रकार के कर्मों को करने में वह स्वतन्त्र होता है।

अब यह उसकी इच्छा है कि वह शुभकर्मों को करता हुआ अपना इहलोक और परलोक सुधार ले अथवा अशुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त होकर अपने इहलोक तो क्या यह परलोक भी बिगाड़ ले। अत: इस मनुष्य जून में जितने अधिक शुभकर्म अथवा पुण्यकर्म अपने खाते में मनुष्य जोड़ पाएगा उतना ही सुख और ऐश्वर्य उसे आने वाले अगले जन्मों में भी मिलेगा। दीपक नेह की चिकनाई और उसमें डाली गई बाती से स्वयं को जलाकर दूसरों को प्रकाश देता है। उसी प्रकार मनुष्य जब दूसरों को अपने प्यार से सराबोर करता है और अपने संयम एवं अनुशासनात्मक जीवन से दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने में सफल होता है तभी वास्तव में वह समाज में प्रकाशित होता है। सबके लिए पूजनीय बन जाता है लोग उसे सिर-आँखों पर बिठाते हैं। ऐसे सज्जन मनुष्य समाज के मार्ग-दर्शक बनते हैं और सबके अराध्य होते हैं।

समाज कल्याण मन्त्रालय द्वारा कई योजनाएँ सामाजिक रूप से पिछड़े इस वर्ग की सुरक्षा हेतु बनाई गई हैं। बहुत-सी समाज सेवी संस्थाएँ भी इस कार्य में सक्रिय हैं परन्तु उनके इन कार्यों के लाभ से अभी भी एक बहुत बड़ा वर्ग वंचित रह जाता है। इनके अतिरिक्त भी देश के गाँवों और प्रदेशों में अपने-अपने स्तर पर अनेक लोग इन परोपकारी कार्यों में नि:स्वार्थ भाव से जुटे हुए हैं। अभी भी इन आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के जीवनों को प्रकाश की महती आवश्यकता है। इनके सच्चे साथी बनकर यदि इनके जीवन को किसी तरह प्रकाशित किया जा सके तो मानव जन्म सफल हो जाएगा। वास्तव में इन्हीं दीपक स्वरूप व्यक्तियों का जीना ही इस ससार में जीना कहलाता है। -चन्द्र प्रभा सूद

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