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Home घर हो आकर्षण का केंद्र

नौ बज चुके थे। काम की अधिकता की वजह से नलिन अभी तक आॅफिस में ही था। उसके सहकर्मी थकान होने के कारण थोड़ा आराम कर रहे थे परंतु वह जल्दी-जल्दी काम निपटा रहा था। उसे इस तरह काम करते देख उसका सहकर्मी अमित बोला, ‘अरे यार, तुम भी थोड़ा आराम कर लो।’

‘नहीं यार, घर के लिए पहले ही काफी देर हो चुकी है। यदि आराम करने बैठ गया तो और भी देर हो जाएगी।’ वह फाइलों पर ही नज़रें गड़ाए हुए बोला। ‘पता नहीं, तुम्हें घर पहुंचने की इतनी जल्दी क्यों रहती है? ‘क्योंकि मेरे घर के सभी सदस्य बड़ी बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहे होते हैं।’ नलिन उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया व पुन: फाइलों पर झुक गया।
घर के दरवाजे पर कदम रखा ही था कि चिंटू, मिंटू, पिंकी, तान्या सभी बच्चे पापा-पापा व चाचा-चाचा पुकारते दौड़े आए व उसकी टांगों पर लिपट गए। उसकी पत्नी व भाभी उसे देखकर मुस्कुरा रही थी और मम्मी-पापा के चेहरों पर भी प्रसन्नता साफ झलक रही थी।

कुछ लोग घर को सिर्फ चारदीवारी की संज्ञा दे डालते हैं। उनके अनुसार घर ईटों व सीमेंट का बना एक मकान मात्र ही तो है परंतु वे शायद यह नहीं जानते कि घर से ही हमारा जीवन शुरू होता है व यहीं आकर समाप्त हो जाता है। तभी तो कहा जाता है कि अपना घर आखिर अपना ही होता है। आप किसी पर्यटन स्थल पर कुछ दिनों के लिए घूमने चले जाएं और बेशक वहाँ आपको असीम आनन्द की प्राप्ति भी होगी परंतु इसके बावजूद जो आनन्द आपको घर वापस लौटने पर मिलेगा, वह इससे कहीं अधिक होगा लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब घर का वातावरण स्वस्थ व शांत हो।Eating family 1

जब कोई अपना घर लौटने में कतराता है तो इससे साफ पता चलता है कि उसके घर का माहौल उसकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। जब कोई यह कहे कि घर में उसका दम घुटता है तो इससे ज़ाहिर होता है कि उसके घर का वातावरण दमघोंटू है। कई बार जब परिवार के किसी सदस्य के साथ अनबन होने पर व्यक्ति घर से दूर भागने लगता है तो इसका मतलब है-घर में आपसी सामंजस्य की बेहद कमी है क्योंकि जब दो इंसान साथ रहते हैं तो उनमें मनमुटाव होना स्वाभाविक है, लेकिन फिर भी उनमें घर लौटने की लालसा बनी रहे, इसके लिए आवश्यक होता है आपसी प्यार व सामंजस्य।

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किसी भी व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करने में घर का अहम् स्थान होता है। अक्सर कहा जाता है कि घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है। यह सही भी है क्योंकि बच्चा शुरू से ही घर में जो देखता है, वही करने का प्रयास करता है व धीरे-धीरे यह उसकी आदत में शुमार हो जाता है व बड़ा होकर यही सब अपने जीवन में अपनाता है।

अब यह तो घर के बड़ों पर निर्भर करता है कि वे बच्चे को कैसे संस्कार देते हैं। यदि घर के बुजुर्ग छोटी-छोटी बातों को लेकर घर में हंगामा खड़ा कर देंगे व पूरे माहौल को तनावपूर्ण बना देंगे तो बच्चे शुरू से ही घर से जी चुराने लगेंगे। घर वही होता है, जहाँ हर कोई चुम्बक की तरह खिंचा चला आए। घर के सदस्य कहीं गए हों तो वहाँ भी उन्हें पल-पल घर की याद सताती रहे व उनके मन में घर लौटने की जल्दी बनी रहे।

अपने घर को आकर्षण का केंद्र बनाएं कुछ ऐसे:

  • घर का प्रत्येक सदस्य खुलकर सांस ले सके, इसके लिए आवश्यक है कि घर का माहौल सदैव उन्मुक्त बना रहे। घर के बड़ों को चाहिए कि वे घर के सम्पूर्ण सदस्यों को एक उन्मुक्त वातावरण दें न कि अपने कठोर नियमों से घर में दमघोंटू माहौल पैदा करें। ऐसा वातावरण बनाएं, जिसमें सास-ससुर, बेटे, बहू, बेटी दामाद व बच्चे सभी एक साथ बैठकर एन्जॉय कर सकें।
  • विपरीत परिस्थितियों में भी माहौल को तनावपूर्ण न बनने दें। कोई समस्या हो तो उसका हल ढूंढने के लिए सभी छोटे-बड़े सदस्यों की सलाह लें व उन्हें हिम्मत व धैर्य की समस्या से निपटने की सलाह व खुद की हिम्मत भी कायम रखें। इस तरह आप बड़ी से बड़ी मुश्किल से भी निजात पा सकेंगे।
  • घर में किसी सदस्य के मानसिक या शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने पर अन्य सभी सदस्यों का कर्तव्य बनता है कि वे उसका उचित इलाज कराएं व उसके खानपान के बारे में सचेत रहें। उसे उसके दु:ख से उबारने का प्रयास करें।
  • सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों को समझते हुए उसे पूर्णरूप से निभाने का प्रयास करें।
  • यदि घर के किसी सदस्य से कोई बड़ी गलती हो जाए तो यह न हो कि दूसरे सदस्य उसे कोसने लगें या फिर इस बात को मोहल्ले में फैला दें। यथासम्भव उसकी गलती को सुधारने का प्रयास करें।
  • सभी सदस्यों के लिए आवश्यक है कि वे आपसी प्यार, सामंजस्य व विश्वास को महत्त्व दें। आपसी मनमुटाव या कोई गलतफहमी होने पर उसे बातचीत द्वारा सुलझाएं। आपसी बातचीत से अपने रिश्तों को सही दिशा प्रदान करें।
  • सभी सदस्य एक-दूसरे के साथ मिलकर अपने सुख दुख बांटें व अपने अनुभवों से परस्पर कुछ सीखने का प्रयास करें। बड़ों को चाहिए कि वे छोटों को जीवन के सही मायनों से अवगत कराएं। अपने अनुभव व ज्ञान उसके साथ बांटें। उन्हें रूढ़ियों व व्यर्थ के रीति-रिवाजों में कैद करके न रखें बल्कि उनके प्रेरणास्रोत व शुभचिंतक बनें और उन्हें अपने अधीन रखने जैसी भूल कदापि न करें। छोटों को भी चाहिए कि वे बड़ों को पूर्ण सम्मान दें व उनका सहारा बनने की कोशिश करें।
  • घर का वातावरण तभी आकर्षण का केंद्र बन सकता है, जब उसमें रहने वाले सभी छोटे-बड़े एक साथ हँस-बोल सकें, खेलकूद सकें। यह नहीं होना चाहिए कि उसके साथ नहीं बोलना, यहाँ नहीं बैठना, वहाँ नहीं जाना इत्यादि।
    स्वतन्त्रता हर किसी को प्यारी होती है और जब अपने ही घर में किसी पर पाबंदी लगती है तो वह घर उसको बांधकर कैसे रख सकता है, अत: घर के बुजर्गों का कर्तव्य बनता है कि वे अपने घर के माहौल को सदैव खुशनुमा बनाए रखने हेतु अन्य सभी सदस्यों को सहयोग प्रदान करें। -भाषणा गुप्ता
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