People लोग क्या कहेंगे?
जिÞंदगी एक ऐसा सफर है, जिसमें हर कदम पर इंसान को कई सवालों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ सवाल हमारे मन से उठते हैं, लेकिन ज्यादातर सवाल वे हैं जो समाज, रिश्तेदार और आसपास के लोग हमारे सामने रख देते हैं। इन सवालों का सबसे बड़ा रूप है- ‘लोग क्या कहेंगे?’ ये तीन शब्दों का छोटा-सा वाक्य ज़िंदगी के बड़े-बड़े फैसलों को बदल देता है, सपनों को तोड़ देता है और इंसान को अपनी मर्जी से जीने की बजाय समाज की उम्मीदों के बोझ तले दबा देता है।
कभी समय मिले तो बैठकर सोचिए, जब आप इस दुनिया से चले जाएंगे, तब क्या होगा? आपकी लाश घर के आंगन में पड़ी होगी। आसपास कुछ लोग बैठे होंगे। कोई उदास होगा, कोई रो रहा होगा, लेकिन इसके साथ ही कुछ लोग अपने-अपने समूहों में बैठकर बातें कर रहे होंगे। कुछ लोग अपने फोन पर फेसबुक की पोस्ट स्क्रॉल कर रहे होंगे, लाइक कर रहे होंगे या शायद आपकी मृत्यु की खबर को स्टेट्स के रूप में डाल रहे होंगे।
थोड़े समय बाद घर में रोने की तेज आवाजें भी बंद हो जाएंगी। लोग अपने-अपने घरों को लौट जाएंगे। आपका परिवार रिश्तेदारों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था में व्यस्त हो जाएगा। कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। आपके न रहने से इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यदि इस दुनिया को आपके जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, तो आप आज इस दुनिया की बातें सुनकर अपनी ज़िंदगी को मुश्किल क्यों बना रहे हैं?
जब माता-पिता अपने बेटे या बेटी की शादी के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले उनके मन में यही ख्याल आता है कि अगर हम सादा विवाह कर लेंगे, तो लोग क्या कहेंगे? यदि बच्चा पढ़ाई के बाद ज़िंदगी में कुछ बड़ा न कर सका तो लोग हमारी परवरिश पर सवाल उठाएंगे। यह सोच हमारे मन में इतनी गहरी बैठ गई है कि हम अपनी जिÞंदगी को अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की नज़रों के हिसाब से जीने लगते हैं।
यह सोच सिर्फ व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि समाज के हर कोने में इसकी छाया दिखाई देती है। जब कोई युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए कुछ अलग करने की ठानता है, तो सबसे पहले उसके भीतर यह डर पनपता है- अगर असफल हो गया तो लोग क्या कहेंगे? कोई कलाकार अपनी कला को दुनिया के सामने लाना चाहता है, तो वह सोच में पड़ जाता है कि अगर लोगों को पसंद नहीं आया, तो उसका मजाक बनेगा। यही डर हर कदम पर उसे रोकता है और उसकी उड़ान से पहले ही पंख काट देता है।
इस मानसिकता का सबसे बड़ा नुकसान तब दिखता है जब माता-पिता समाज की नज़रों से डरकर अपने बच्चों पर अपनी इच्छाएँ थोपते हैं। वे चाहते हैं कि बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने, केवल इसलिए कि समाज इन पेशों को ‘सम्मानजनक’ मानता है। अगर बच्चा कुछ अलग करना चाहे, तो परिवार को चिंता सताती है कि लोग क्या कहेंगे।
इसके विपरीत, जो लोग जीवन में सफल हुए हैं, वे इन सामाजिक बंधनों को तोड़ते हैं। वे अपने दिल की सुनते हैं, अपने सपनों के पीछे मेहनत करते हैं और अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं। वही लोग इतिहास रचते हैं। ज़िंदगी एक मौका है, जो हमें अपने तरीके से जीने के लिए मिलता है।
अगर हम इस मौके को समाज के डर की वजह से गँवा देते हैं, तो यह हमारी सबसे बड़ी हार है। जो सपने तुम्हारी आँखों में चमक लाते हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश करो। इस दुनिया की बातें सुनकर अपने आपको बेड़ियों में मत जकड़ो, क्योंकि यह दुनिया तुम्हारे बिना भी चलेगी, लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी केवल तुम्हारे लिए है। -संदीप कुमार, रूपनगर

































































